पटना, आलोक मिश्र। बिहार में न तो विकास अभी इतना विकास कर सका है और न ही महंगाई इतना असर डाल सकी है कि चुनाव में जाति से आगे निकल सके। इस समय दो विधानसभा क्षेत्रों में हो रहे उपचुनाव में यह साफ दिखाई दे रहा है। जिसमें विकास पर सवाल को कुंद करने के लिए एनडीए, लालू और उनके राज को जंगल ठहराने को कारगर मान रहा है तो राजद (राष्ट्रीय जनता दल) इन सीटों के सहारे सत्ता पाने का सपना दिखा रहा है, लेकिन चौसर पर सभी ने लड़ाके जाति के हिसाब से ही तय किए हैं। पक्ष और विपक्ष, दोनों को ही इसी पर भरोसा है। पेट्रोल-गैस, दाल-तेल की बातें केवल चौराहों पर ही सिमटी हैं।

बिहार में तारापुर एवं कुशेश्वरस्थान पर हो रहे उपचुनाव पक्ष-विपक्ष दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। तेजस्वी इन दोनों के बूते सत्ता पाने का दावा जनता के बीच कर रहे हैं तो नीतीश दो विधायकों को अपने पाले में करने के बाद भी दो के देहांत के कारण 43 पर ही टिके हैं, वे इसे बढ़ाने के लिए हर दांव चल रहे हैं। इस चुनाव में प्रत्याशी भले ही जदयू के हों, लेकिन पूरा एनडीए उनके पक्ष में एकजुट है। जबकि महागठबंधन बिखरा है।

कुशवाहा वोटों पर प्रभाव रखने वाले तारापुर से छह बार विधायक रहे शकुनी चौधरी के छोटे पुत्र रोहित चौधरी का जदयू में स्वागत करते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। सौजन्य : सूचना एवं जनसंपर्क विभाग

तारापुर में राजद और कुशेश्वरस्थान में कांग्रेस का प्रत्याशी पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर था। कांग्रेस को यह सीट राजद ने नहीं दी तो उसने भी दोनों सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए। वहीं पिछली बार पूरी लोजपा को लेकर मैदान में नीतीश के खिलाफ उतरे चिराग इस बार अधूरे हैं। चाचा पशुपति कुमार पारस के कारण बंटी लोजपा में रामविलास का नाम जोड़ लड़ रहे हैं। ऐसे में पहली नजर में तो बंटा विपक्ष जदयू के लिए फायदेमंद नजर आता है और अपनी सीटें अपनी झोली में डालने को आतुर भी। लेकिन लड़ाई इतनी आसान भी नहीं है, क्योंकि चुनाव जातिगत समीकरणों पर भी काफी निर्भर है।

बिहार में जाति आधारित राजनीति का ही बोलबाला रहा है। चुनाव चाहे जिस मुद्दे पर लड़ा जाए, आखिर में जाति पर ही आकर टिक जाता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही है। इस बार के चुनाव में भी दलों ने विकास या मंहगाई जैसे मुद्दों पर उतना भरोसा नहीं किया जितना जातिगत समीकरणों के आधार पर टिकट के बंटवारे पर।

तारापुर में जदयू ने इस बार भी कुशवाहा पर ही भरोसा जताया जोकि विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा हैं। अति पिछड़ी जातियों व कुर्मी वोटों के सहारे उसे फिर बाजी मारने का भरोसा है, जबकि पिछली बार यादव प्रत्याशी उतार कर हारने वाली राजद ने इस बार दूसरे सबसे ज्यादा बड़े वोट बैंक वैश्य समुदाय से प्रत्याशी उतार तगड़ी चुनौती पेश कर दी है। इसके अलावा अपने परंपरागत वोट बैंक यादव व मुस्लिम को वह अपना ही मान रहा है। वहीं कांग्रेस के बाह्मण प्रत्याशी और लोजपा (रामविलास) के ठाकुर प्रत्याशी भी समीकरणों को बनाने-बिगाड़ने में काफी असर डालने वाले हैं। दूसरी तरफ कुशेश्वरस्थान सीट सुरक्षित होने के कारण एनडीए सवर्ण वोट बैंक के बूते अपने को मजबूत मान रहा है।

इन समीकरणों के बीच बाकी बातें दब जा रही हैं। चौक-चौराहों पर पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें, गैस सिलेंडर की चट होती सब्सिडी, दाल-तेल के बढ़ते दाम कुछ देर तो बहस का मुद्दा बनते हैं, लेकिन चुनावी हार-जीत की तरफ बात मुड़ते ही जाति इन सब पर भारी पड़ जाती है। नेताओं के भाषण के भी ये शुरुआती अंश होते हैं, लेकिन बाद में दिशा एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आक्षेप की तरफ मुड़ जाती है।

उल्लेखनीय यह भी कि 16 साल से सत्ता से दूर लालू इस चुनाव में भी प्रासंगिक हैं। सत्ता पर काबिज एनडीए अपनी उपलब्धियों पर कम लालू के राज को जंगलराज ठहराने और तेजस्वी पर व्यक्तिगत हमले पर ज्यादा भरोसा कर रहा है। वहीं जवाब में तेजस्वी मंहगाई पर तो कुछ देर टिकते हैं, लेकिन उसके बाद इन दो सीटों पर जीत के सहारे सत्ता पाने का सपना दिखाना शुरू कर देते हैं। शब्दों के इन बाणों के अलावा क्षेत्र में लगाई जाने वाली फिल्डिंग जातिगत आधार पर ही सभी दल कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि हमेशा की तरह जातीय गोलबंदी फिर बाजी मारेगी या इस बार मुद्दे असर डालेंगे।

[स्थानीय संपादक, बिहार]

Edited By: Sanjay Pokhriyal