पटना, मृत्युंजय मानी। Tourism in Bihar: बिहार में पर्यटकों की रुचि वाले स्‍थलों में वाल्म‍ीकिनगर टाइगर रिजर्व यानी वीटीआर (Valmikinagar Tiger Reserve) अपना खास स्‍थान बना चुका है। प्रकृति के सान्‍न‍िध्‍य का जो आनंद यहां मिलता है, वह किसी को भी मंत्रमुग्‍ध कर सकता है। हिमालय की तराई और गंडक नदी के किनारे बसे वीटीआर (VTR) में मानसून के आते ही 15 जून से पर्यटकों के भ्रमण पर रोक लगा दी जाती है। इस वर्ष 15 अक्टूबर के बाद वाल्मीकिनगर व्याघ्र परियोजना में पर्यटकों को प्रवेश मिल सकता है। फिलहाल बाढ़ और बारिश की वजह से जंगल में जगह-जगह रास्ते कट गए हैं। घास बड़ी हो गई है। भ्रमण वाले क्षेत्र में बारिश बंद होने के बाद रास्‍तों को सामान्य बनाने की जरूरत पड़ती है।

ठंड का मौसम यहां घूमने के लिए सबसे बेहतर

यह मौसम जानवरों के प्रजनन का है। ठंड का मौसम आते ही व्‍याघ्र परियोजना में अलग-अलग जानवरों के बच्चे दिखने लगते हैं। दिसंबर से अप्रैल के बीच बाघ शावक भी दिखने लगते हैं। उन्हें हिरण, सांभर, गौर आदि के बच्चे भोजन के रूप में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। मानसून के दौरान घड़ियाल, मगर, सांप, कछुआ और पक्षी अंडे देते हैं। घास बड़ी हो जाती है और शाकाहारी जानवरों को भी भोजन पर्याप्‍त मात्रा में मिलने लगता है।

वाल्मि‍कीनगर से जुड़े जंगलों में 160 बाघ

बिहार में वाल्मीकि नगर व्याघ्र परियोजना में तेजी से बाघों की संख्या में वृद्धि हो रही है। 12 वर्षों में आठ बाघ से बढ़कर संख्या 31 हो गयी है। गणना के दौरान यहां 10 शावक भी मिले थे। 2008 में यहां आठ बाघ थे। 2022 की गणना में बाघों की संख्या 50 से अधिक पहुंचने की संभावना है। वाल्म‍िकीनगर का वन क्षेत्र 900 वर्ग किमी में स्थित है। इस जंगल से नेपाल के चितवन और परसा तथा उत्तर प्रदेश के सुहागी वन्य प्राणी आश्रयणी का क्षेत्र भी जुड़ा हुआ है। चारों आश्रयणियां मिलकर चार हजार वर्ग किलोमीटर में हैं। इस पूरे क्षेत्र में करीब 160 बाघ हैं।

सैंक्टम सेंक्टोरम जोन और कोर जोन में जाने नहीं है अनुमति

जानवरों के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने के लिए वन्य प्राणी आश्रयणियों को तीन भागों में बांटा गया है। सैंक्टम सेंक्टोरम जोन में किसी भी व्‍यक्ति को प्रवेश की अनुमति नहीं है। कोर जोन उसके किनारे वाला भाग होता है। इसमें भी किसी को आने-जाने की अनुमति नहीं होती है। पर्यटक भी नहीं जाते हैं। यहां से निगरानी की व्यवस्था है। सबसे किनारे वाला क्षेत्र बफर जोन होता है। यहां पर्यटक भ्रमण कर सकते हैं। पर्यटकों को कोर जोन के किनारे वाले भागों में भ्रमण की अनुमति होती है।

मानव की बढ़ती आबादी के बीच सिकुड़ रहे हैं जंगल

मनुष्यों की बढ़ती आबादी के कारण वन्य जीवों के आवासीय क्षेत्र लगातार घटते जा रहे हैं। अधिवास स्थल सिकुड़ गए हैं। अब वन्य प्राणियों के लिए सुरक्षित जगह पर्यावरण संतुलन के लिए अनिवार्य हो चुकी है। वन्य प्राणी आश्रयणी का संरक्षण इसी दिशा में उठाया गया कदम है। जंगल आक्सीजन की फैक्ट्री का भी कार्य करता है। कोशिश यह रहती है इन आश्रयणियों में मानव दखल कम से कम हो। तमाम वजहों से मानव बल का इस इलाका में आना-जाना लगा रहता है। ऐसे में इस आश्रयणियों में पूरी तरह प्राकृतिक जंगल का लाभ ये पशु-पक्षी नहीं उठा पाते हैं। फिर भी संरक्षण से उनकी आवश्यकता काफी हद तक पूरी होती है।

दखलअंदाजी वन्य जीवों का जीवन चक्र प्रभावित

प्राकृतिकवास में दखलअंदाजी से वन्य जीवों का जीवनचक्र प्रभावित होता है। जाहिर है ऐसे में वन्य जीवों के लिए प्रजनन एवं वंश वृद्धि के लिए प्राकृतिक वातावरण सर्वाधिक आवश्यक होता है। इस दौरान किसी प्रकार का हस्तक्षेप होने पर वन्यजीव बर्दाश्‍त नहीं करते हैं तथा उग्र हो जाते हैं। आश्रयणियों में प्रकृति वातावरण में व्यवधान की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।

बिहार में 3550.31 वर्ग किमी में है प्राकृतिक वन क्षेत्र

बिहार में वन्य प्राणियों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए 3550.31 वर्ग किमी में प्राकृतिक वन हैं। वाल्मीकि नगर व्याघ्र परियोजना में बाघ, तेंदुआ, भालू सहित कई प्रकार के वन्य प्राणी हैं। कैमूर वन्य प्राणी आश्रयणी में बाघ-आते जाते हैं तथा तेंदुआ सहित बड़ी संख्या में शाकाहारी जानवर हैं। पश्चिम चंपारण में उदयपुर वन्य प्राणी आश्रयणी, गया में गौतम बुद्ध वन्य प्राणी आश्रयणी, मुंगेर में भीमबांध वन्य प्राणी आश्रयणी, राजगीर में पंत वन्य प्राणी आश्रयणी, सुलतानगंज से कहलगांव के बीच 60 किमी में विक्रमशिला गांगेय डाल्फिन आश्रयणी, नवादा में रजौली वन्य प्राणी आश्रयणी, नागी डैम डैम पक्षी आश्रयणी, नकटी डैम पक्षी आश्रयणी, कांवरझील पक्षी आश्रयणी, कुशेश्वर स्थान पक्षी आश्रयणी, वैशाली में सलीम अली जुब्बा साहनी बरैला झील पक्षी आश्रयणी है।

शावकों को जन्‍म देने से पहले सुरक्षित स्‍थल पर चली जाती है बाघिन

प्रधान मुख्य वन संरक्षक सह मुख्य वन्य प्राणी प्रतिपालक प्रभात कुमार गुप्ता ने बताया कि शावकों के जन्म देने के पहले बाघिन सुरक्षित स्थल पर चली जाती है। शावकों को कुछ दिनों बाद लेकर बाहर निकलती है। वाल्मीकि नगर टाइगर रिजर्व में बाघ शावक हमेशा देखते हैं। 15 जून से मानसून आते हैं। बारिश के बाद जंगलों को समृद्ध होने का मौका मिल जाता है। इस कारण पर्यटकों के आगमन पर रोक लगा दी जाती है। सड़कें भी कच्ची रहने के कारण जाने लायक स्थिति नहीं रहती है। जंगल और वन्य जीवों के वंश वृद्धि के अनुकूल समय मिल जाते हैं।

वीटीआर के फील्‍ड डायरेक्‍टर एसके राय ने बताया कि मानसून के दिनों में साढ़े तीन माह से पांच माह तक राष्ट्रीय उद्यान को बंद रखने की व्यवस्था है। इस दौरान जंगल और वन्य प्राणी में री-जेनरेशन होता है। पर्यटकों को सिर्फ बफर जोन में ही भ्रमण कराया जाता है।