पटना, जेएनएन। पहले थाना पुलिस से लेकर पुलिस अफसर के पास मुखबिरों की लंबी सूची हुआ करती थी। इनकी मदद से पुलिस संदिग्ध से लेकर अपराध की योजना बनाने वाले अपराधियों तक आसानी से पहुंच जाती थी। लेकिन पिछले कुछ सालों से पुलिस की जांच तकनीकी अनुसंधान पर टिकी है। मोबाइल और सीसी कैमरे को ही मुखबिर मान बैठी है। अब कुछ केस को छोड़कर अन्य कई मामलों में फुटेज मिलने के बाद भी पुलिस अपराधियों तक नहीं पहुंच पा रही है। यहां तक की लुटेरों और चोरों का ठिकाना तक पुलिस को नहीं पता। यहीं नहीं, लोगों से संपर्क बढ़ाने के लिए चौपाल से लेकर जनता दरबार तक थानों पर नहीं लगता है।

फुटेज लेकर घूमते रह गई पुलिस, नहीं मिले चोर

पिछले चार माह में दो दर्जन से अधिक घरों में चार करोड़ से अधिक की संपत्ति चोर उड़ा ले गए। जिस सीसी कैमरे पर पुलिस भरोसा जता रही है, उन्हीं कैमरों का फुटेज हाथ में आने के बाद भी केस का उद्भेदन नहीं हो पा रहा है। एक भी गैंग की पहचान नहीं हो सकी। पुलिस थक हारकार चोर को पकड़ने की बजाए, कहीं और चोरी न हो जाए इस पर काम करना शुरू कर देती है। चूंकि अधिकांश मामलों में चोर मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करते तो तकनीकी अनुंसाधन भी इसमें काम नहीं आ रहा।

विश्वास नहीं बना सकी पुलिस

कई मुखबिरों ने अगर पुलिस को जानकारी दी, तो वह बात बाहर तक आ जाती थी। सूत्रों की मानें तो ऐसे में उनकी जान पर ही आफत आ जाती है। मुखबिर सूचना देने से पहले निश्चिंत होना चाहते हैं कि विश्वास पूरा हो, पर ऐसा करने में पुलिस कामयाब नहीं हो पा रही है।

वार्ड पुलिसिंग कागज में, संपर्क कम

तत्कालीन डीआइजी राजेश कुमार ने शहर में जहां सबसे अधिक घटना होती थी, उस इलाके को हॉट स्पॉट बनाने का निर्णय लिया। फरमान भी जारी हो गया, लेकिन हॉट स्पॉट कहां बनाने हैं, यह आज तक तय नहीं हुआ। फिर हर वार्ड में पुलिस की तैनाती होनी थी, जिनका नंबर वहां सार्वजनिक स्थल पर दर्ज होना था, ताकि वह लोगों से संपर्क के साथ ही संदिग्ध पर नजर रख सके। पूरी योजना बनी। बल की संख्या भी तय हुआ, लेकिन फरमान फाइलों में दब गया। इस तरह क्विक मोबाइल टीम काफी सक्रिय थी, लेकिन फायदा कम और शिकायतें अधिक मिलने लगी। बाद में यह भी कमजोर हो गए।

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