शनिवार से वासंतीय नवरात्र की शुरुआत हो जाएगी। हिन्दी कैलेंडर के चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना के साथ ही देवी दुर्गा को समर्पित नवरात्र प्रारंभ होगी। देवी दुर्गा के लाखों भक्त पूजा पाठ और देवी मंत्रों की अराधना में लीन हो जाएंगे। इन तमाम भक्तों में नवरात्र को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। ऋषिकेश पंचांग के अनुसार कलश स्थापना अभिजीत मुहूर्त में करना शुभ होगा। पंचांग में सुबह के 11:35 बजे से दिन के 12:24 मिनट तक कलश स्थापना करना शुभ बताया गया है। कलश स्थापना को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह, तैयारियां पूरी

- चैत्र नवरात्र की कलश स्थापना को लेकर तमाम श्रद्धालुओं में उत्साह है। कलश स्थापना व पूजा पाठ से जुड़ी सभी तरह की तैयारियां कर ली गई हैं। शुक्रवार को श्रद्धालु जरूरी तैयारी में जुटे रहे। बाजार में मिट्टी के कलश, दीया, चुक्का, कपटी की खरीदारी हुई। सब्जी मंडी से लेकर गोला रोड, गोंदापुर, पार नवादा में कुम्हारों के यहां लोग मिट्टी के कलश आदि खरीद कर लाते दिखे। पूजन सामग्री की बात करें तो घी, हुमाद, सिदूर, धूप बत्ती, पुष्प माला, पंचमेवा, फल खरीदे गए हैं। श्रद्धालुओं ने अपने-अपने पूजा घरों मे भी तैयारी की है। अनेक श्रद्धालु पूरे नवरात्र में सिर्फ फलाहार ही रहते हैं। अतुलनीय सिद्धियां तथा शक्तियां प्रदान करती है नवरात्रि : पं. दिव्यांशु

- नवरात्र में देवी दुर्गा की पूजा व मंत्रों के जप को शास्त्रों में काफी प्रभावकारी बताया गया है। नवादा के ज्योतिषाचार्य दिव्यांशु शेखर पाठक ने कहा कि कलियुग मे शक्ति की उपासना एवं साधना शीघ्र प्रभावशाली एवं तत्काल फलदायी मानी गई है। शक्ति-उपासना में तांत्रिक मंत्र विशिष्ट माने गए हैं। तांत्रिक मंत्रों की ²ष्टि से दुर्गा सप्तशती सर्वोपरि हैं। दुर्गा सप्तशती में देवी के लिए 700 शक्तिशाली एवं प्रभावशाली श्लोकों की रचना की गई हैं। देवी की आराधना में दुर्गा सप्तशती एक महत्वपूर्ण कुंजी है। कहा जाता है कि जो साधक नवरात्रि में देवी के लिए दुर्गा सप्तशती का सम्पूर्ण पाठ नौ दिनों तक करता है, वह धीरे-धीरे दुर्लभ सिद्धियों, शक्तियों व उपल्बधियों को सहज ही प्राप्त कर लेता है। सिद्ध एवं शक्ति सम्पन्न महात्माओं द्वारा यह बात स्वीकार भी किया गया है। सिर्फ देवी की अराधना ही एक ऐसी अराधना है जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थ को प्रदान करती है।

श्री पाठक बताते हैं कि तत्काल सिद्धि प्राप्ति के लिए स्वयं जगदम्बा अपने श्रीमुख से कहतीं हैं- अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी को जो एकाग्रचित होकर मेरे 1, 2, 9, व 10वें अध्यायों के प्रसंगों का पाठ करेंगे उन्हें कोई पाप स्पर्श नहीं कर सकेगा। उसके घर कभी दरिद्रता नहीं आएगी, उनके परिजनों मे कभी अकाल मृत्यु नहीं होगी। अनेक प्रकार की सिद्धियां स्वयं साधक को उपलब्ध हो जाएगी। नवदुर्गा की सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ समय आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तथा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तिथि है।

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नवरात्रि में इन बातों का रखें ध्यान

- देवी का आह्वान बिल्वपत्र, बिल्वशखा, त्रिशूल या श्रीफल पर किया जाता है।

- देवी पीठ पर बांसुरी, शहनाई व माधुरी भूलकर भी न बजाएं।

- कलश स्थापना व अभिषेक का कार्य केवल दिन में होता है। मध्य रात्रि में देवी के प्रति किया गया हवन शीघ्र फलदायी माना गया है।

- देवी उपासक के गले में रूद्राक्ष व मूंगा की माला अवश्य होनी चाहिए।

- कवच के मंत्रों से कभी हवन न करें।

- चतुर्थ अध्याय के मंत्र 24 से 27 की आहुति वर्जित है। इन चार मंत्रों की जगह ऊँ महालक्ष्म्यै नम: से चार बार आहुति समर्पित करनी चाहिए।

- हवनात्मक प्रयोग में प्रत्येक अध्याय के आदि व अंत में मंत्रों को शर्करा, घृत, व लौंग से युक्त करके क्षीर की आहुति देनी चाहिए।

- पाठ के अंत में सिद्ध कुंजिका स्त्रोत का पाठ आवश्यक है।

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ब्रह्मांड में सर्वाधिक शक्तिशाली हैं देवी के बीज मंत्र:

- ब्रह्मांड में सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्रों में बीज मंत्रों का अपना प्रभाव है। बीज मंत्र देवी या अध्यात्मिक शक्ति को अभिव्यक्ति देने वाला सांकेतिक अक्षर बीज कहलाता है। इसकी शक्ति अनंत है। बीज मंत्र विभिन्न देवताओं धर्मो एवं संप्रदायों की साधनाओं के माध्यम से साधक को विभिन्न प्रकार के रहस्य से परिचित करवाता है और अतुलनीय सिद्धि प्रदान करता है।

Posted By: Jagran