सरकारी दफ्तरों की तरह बैलों को भी मिलती है संडे की छुट्टी; किसान नहीं कराते काम, नवादा की 80 साल पुरानी परंपरा
नवादा के रोह प्रखंड में किसान बैलों और भैंसों को रविवार को खेतों में काम नहीं कराते, यह 80 साल ...और पढ़ें

सप्ताह में छह दिन ही बैलों का खेती कार्य में होता उपयोग। जागरण
HighLights
नवादा के रोह प्रखंड में बैलों को रविवार को छुट्टी मिलती है।
यह पशुओं के प्रति सम्मान की 80 साल पुरानी परंपरा है।
किसान पशुओं को आराम देकर उनकी सेहत का ध्यान रखते हैं।
अविनाश निराला, रोह (नवादा)। सरकारी और निजी कार्यालयों में सप्ताह में एक दिन की छुट्टी आम बात है। लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि खेतों में काम करने वाले बैलों और भैंसों की भी सप्ताह में एक दिन छुट्टी होती है?
नवादा के रोह प्रखंड के कई गांवों में यह परंपरा आज भी कायम है। यहां किसान रविवार को हल-बैल से खेतों की जुताई नहीं करते। कृषि कार्य में इस्तेमाल होने वाले बैल और भैंसे इस दिन पूरे दिन आराम करते हैं।
रोह प्रखंड के कुंजैला, कुंज, कुम्हरावां, डुमरी, हेमजा और काजीचक गांवों में किसान वर्षों से इस परंपरा का पालन कर रहे हैं।
इन गांवों में जिन किसानों के पास आज भी हल-बैल की जोड़ी है, वे रविवार को उनसे खेतों में कोई काम नहीं लेते। सप्ताह के बाकी दिनों में कृषि कार्य में जुटे रहने वाले पशुओं को रविवार को पूरी तरह आराम दिया जाता है।
हालांकि आधुनिक दौर में खेती का स्वरूप काफी बदल गया है। ट्रैक्टर और अन्य कृषि यंत्रों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण हल-बैल से खेती का चलन काफी कम हुआ है।
इसके बावजूद इन गांवों में जिन किसानों के पास एक-दो जोड़ी बैल बचे हैं, वे रविवार को जुताई का काम नहीं कराते। किसानों के लिए यह केवल छुट्टी नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी परंपरा और पशुओं के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
एक दिन आराम से पशु भी रहते हैं स्वस्थ
किसानों का कहना है कि लगातार काम करने से पशुओं पर भी थकान का असर पड़ता है। सप्ताह में एक दिन उन्हें आराम देने से पशु अगले दिन अधिक ऊर्जा के साथ काम करते हैं।
इससे किसानों को भी एक दिन आराम मिल जाता है और वे अगले दिन नई ऊर्जा के साथ खेती के काम में जुटते हैं।
किसानों के अनुसार, बैल खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। ऐसे में उन्हें आराम देना उनकी सेहत के लिए भी जरूरी है। आधुनिक कृषि यंत्रों के बावजूद जिन किसानों के पास बैल हैं, वे इस परंपरा को आज भी नहीं भूले हैं।
पूर्वजों से चली आ रही परंपरा आज भी कायम
कुंजैला गांव के 80 वर्षीय किसान प्रसादी महतो बताते हैं कि उनके गांव के साथ आसपास के कई गांवों में भी रविवार को हल-बैल से खेतों की जुताई नहीं करने की परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है।
उन्होंने कहा कि बचपन से ही उन्होंने अपने घर और गांव के किसानों को रविवार को बैलों को आराम देते देखा है। अब नई पीढ़ी भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
डुमरी गांव के निजी विद्यालय के शिक्षक प्रताप प्रसाद कहते हैं कि किसान बैलों को केवल खेती में इस्तेमाल होने वाला पशु नहीं मानते, बल्कि उन्हें परिवार और खेती की समृद्धि का हिस्सा समझते हैं।
उनके अनुसार, 'जानवर हमारे लिए लक्ष्मी के समान हैं। लक्ष्मी का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है।' इसी भावना के कारण उनके गांव में भी पूर्वजों के समय से रविवार को बैलों से खेतों की जुताई नहीं कराई जाती है।
मशीनी खेती के दौर में भी नहीं टूटी परंपरा
ट्रैक्टर और आधुनिक कृषि उपकरणों ने खेती के तरीके को भले ही बदल दिया हो, लेकिन रोह प्रखंड के इन गांवों में पुरानी परंपरा आज भी जीवित है।
खेतों में हल-बैल का इस्तेमाल कम हो गया है, पशुओं की संख्या भी पहले की तुलना में घट गई है, लेकिन जिन किसानों के पास ये पशु हैं, उनके लिए रविवार आज भी 'आराम का दिन' है।
खास बात यह है कि इस परंपरा के पीछे किसी सरकारी आदेश या नियम का नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और पशुओं के प्रति संवेदना का आधार है।
