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नाना के संस्कार से सेना तक का सफर, अब नवादा के बेटे मेजर अंशुमान को सेना मेडल; द‍िखाया था अदम्‍य साहस

Published: Wed, 19 Aug 2026 02:22 PM (IST)

नवादा के मेजर अंशुमान रंजन को जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियान में अदम्य साहस और नेतृत्व के लिए सेना मेडल ...और पढ़ें

पत्‍नी के साथ और अपनी बटालियन में मेजर अंशुमान रंजन। सौ-स्‍वजन

पत्‍नी के साथ और अपनी बटालियन में मेजर अंशुमान रंजन। सौ-स्‍वजन

HighLights

  1. मेजर अंशुमान रंजन को स्वतंत्रता दिवस पर सेना मेडल मिला।

  2. जम्मू-कश्मीर में दो जैश-ए-मोहम्मद आतंकियों को मार गिराया।

  3. नवादा के सपूत ने देशसेवा में अदम्य साहस दिखाया।

जागरण संवाददाता, नवादा। नवादा की मिट्टी में पले-बढ़े मेजर अंशुमान रंजन ने आतंकवाद के खिलाफ अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता का परिचय देकर जिले का नाम रोशन किया है।

जम्मू-कश्मीर में फरवरी में चलाए गए एक महत्वपूर्ण आतंकवाद विरोधी अभियान में अपनी टीम का नेतृत्व करते हुए उन्होंने जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े दो आतंकियों को मार गिराने में अहम भूमिका निभाई थी।

अभियान के दौरान प्रदर्शित साहस, नेतृत्व और कर्तव्यनिष्ठा के लिए स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया।

मेजर अंशुमान को मिला यह सम्मान न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत वीरता की पहचान है, बल्कि नवादा के लिए भी गर्व का विषय है। उनके सम्मानित होने की खबर से परिवार, स्वजन और जिले के लोगों में खुशी का माहौल है।

दुर्गम पहाड़ और जंगल में चला था ऑपरेशन

फरवरी में जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले के बसंतगढ़ क्षेत्र में आतंकियों की मौजूदगी की सूचना सुरक्षाबलों को मिली थी। यह इलाका दुर्गम पहाड़ी और घने जंगलों से घिरा हुआ था।

खुफिया इनपुट के आधार पर सुरक्षाबलों ने आतंकियों के खिलाफ 'ऑपरेशन केया' शुरू किया। अभियान के दौरान मेजर अंशुमान रंजन ने अपनी टीम का नेतृत्व किया।

चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों के बीच आतंकियों की ओर से फायरिंग किए जाने के बावजूद उनकी टीम ने संयम बनाए रखा और अभियान को आगे बढ़ाया। मुठभेड़ के दौरान जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े दो आतंकियों को मार गिराया गया।

अभियान में मेजर अंशुमान की नेतृत्व क्षमता, साहस और कर्तव्य के प्रति समर्पण ने उन्हें सेना के प्रतिष्ठित सम्मान का हकदार बनाया।

किसान पिता के बेटे ने चुनी देशसेवा की राह

मेजर अंशुमान रंजन नवादा के एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं। उनके पिता प्रियरंजन प्रसाद सिंह किसान हैं, जबकि मां कुमारी अर्चना पंचायत स्तर पर सरकारी सेवा में कार्यरत हैं।

परिवार में छोटी बहन अमीषा रंजन और पत्नी नारायणी शर्मा हैं। सीमित संसाधनों के बीच पले-बढ़े अंशुमान ने मेहनत, अनुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर भारतीय सेना में अधिकारी बनने का सपना पूरा किया।

उनके जीवन में नाना जी की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। बचपन में मिले संस्कारों और देशसेवा की भावना ने उनके मन में सेना में जाने की इच्छा को मजबूत किया।

'मेडल पूरी टीम की मेहनत का परिणाम'

सेना मेडल मिलने के बाद भी मेजर अंशुमान इस उपलब्धि का श्रेय अकेले खुद को नहीं देते। उनका कहना है कि किसी भी सैन्य अभियान की सफलता किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं होती।

इसके पीछे पूरी टीम का प्रशिक्षण, आपसी विश्वास, बेहतर तालमेल और सामूहिक प्रयास होता है। उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों, साथियों और परिवार के सहयोग को भी अपनी सफलता का महत्वपूर्ण आधार बताया।

उनका मानना है कि टीम भावना ही कठिन से कठिन परिस्थितियों में अभियान को सफल बनाने की सबसे बड़ी ताकत होती है।

युवाओं से बड़े सपने देखने का आह्वान

मेजर अंशुमान रंजन ने नवादा के युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की पारिवारिक या आर्थिक पृष्ठभूमि उसकी सफलता की सीमा तय नहीं करती।

लक्ष्य स्पष्ट हो और अनुशासन के साथ लगातार मेहनत की जाए तो किसी भी क्षेत्र में ऊंचा मुकाम हासिल किया जा सकता है।

उन्होंने युवाओं से बड़े सपने देखने और पूरी लगन के साथ उन्हें हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि इससे परिवार, समाज और जिले का नाम भी रोशन होता है।

मेजर अंशुमान ने कहा, 'मुझे गर्व है कि मैं नवादा की मिट्टी से आता हूं। मेरी इच्छा है कि यहां के युवा बड़े सपने देखें, कठिन मेहनत करें और जिस भी क्षेत्र में जाएं, देश और अपने जिले को गौरवान्वित करें।'