बिहारशरीफ। आजादी के बाद देश को संवारने की जिम्मेवारी सबसे बड़ी थी। स्वतंत्रता के बाद हमें शिक्षा का ध्वस्त रूप मिला। जिसे खड़ा करना हमारी लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। लेकिन संसाधन की कमी तथा आर्थिक विपन्नता रोड़ा बनी थी। ऐसे में देश के कई लोगों ने शिक्षा के स्तंभ को मजबूत करने का बीड़ा उठाया। ऐसे लोगों की फेहरिस्त में नालंदा के नीरपुर गांव निवासी गिरवरधारी सिंह भी शामिल हैं। जिन्होंने अपनी पूरी जिदगी शिक्षा को मुकाम देने में व्यतीत कर दिया।

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आजादी के बाद नालंदा के नीरपुर गांव में न बिजली थी न शिक्षा की कोई व्यवस्था : शिक्षा प्राप्त करने के लिए लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। अपने गांव में शिक्षा की व्यवस्था न होना गिरवरधारी सिंह को कचोटने लगा। उन्होंने बिना सोचे अपने मित्रों की सहायता से विद्यालय की इमारत खड़ी करने की ठानी। बात सन् 1953 का है। मित्रों तथा गांव के कई लोगों की सहायता से सबसे पहले उन्होंने हजारों की संख्या में ईंट पाड़ी। उसके बाद उसे पकाया। पूरे काम में गांव के लोग तथा इनके पिता जी का भरपूर सहयोग

मिला। धीरे-धीरे दो कमरे का विद्यालय तैयार हो गया। बच्चे जुटने लगें। इस छोटे से भवन को सरकारी विद्यालय का दर्जा भी मिल गया। इन्होंने कई वर्षों तक यहां पढ़ाई भी की। बाद में इसी विद्यालय के शिक्षक भी बनें।

सन 2002 में वे विद्यालय से रिटायर हो गएं। लेकिन विद्यालय से उनका प्रेम खत्म नहीं हुआ। अवकाश ग्रहण करने के बाद भी वे 12 वर्षों तक विद्यालय को मुफ्त सेवा देते रहें। वहीं अपने गांव की शिक्षा को शिखर पर पहुंचाने के लिए उन्होंने एक ट्रस्ट की स्थापना भी की । जिसमें अनुदान के तौर पर उन्होंने 1 लाख 25 हजार रुपए दिए। ट्रस्ट का काम गरीब तथा होनहार बच्चों की मदद करना है। इसके लिए प्रत्येक वर्ष सितम्बर माह में पूरी प्रक्रिया के साथ जांच परीक्षा ली जाती है। अच्छे अंक प्राप्त करने वाले बच्चों को प्रोत्साहन राशि के साथ पठन-पाठन सामग्री भी दी जाती है।

आज गांव में नीरपुर मध्य विद्यालय, नीरपुर उच्च विद्यालय, धनेश्वरी कन्या उच्च विद्यालय नामक तीन विद्यालय हैं। ट्रस्ट का लाभ इन तीनों विद्यालयों के विद्यार्थियों को मिल रहा है। गिरवरधारी सिंह का सपना आर्थिक रुप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए एक बड़े विद्यालय की स्थापना करना है। ताकि शिक्षा ग्रहण करने में गरीब बच्चों के समक्ष आर्थिक तंगी आड़े न आए।

Edited By: Jagran