नालंदा। प्रखंड क्षेत्र के ओंदा पंचायत का एकमात्र संस्कृत विद्यालय प्रशासन कि उदासीन रवैये के कारण खंडहर में तब्दील हो चुका है। खंडहरनुमा इस विद्यालय में करीब ढाई से तीन सौ बच्चे ज्ञान अर्जित करने को हर दिन पहुंचते है। इस विद्यालय की स्थापना आजादी के बारह वर्ष बाद वर्ष 1957 में हुई थी। स्थापना के बाद से इस विद्यालय से पढ़कर एक से बढ़कर एक विद्वान निकले। लेकिन आज इस विद्यालय की स्थिति काफी बदतर हो गई है। आज यहां न तो छात्रों के बैठने के लिए समुचित व्यवस्था है और न ही पेयजल और शौचालय की व्यवस्था है। यहां तक कि पठन-पाठन के लिए समुचित संसाधनों का भी घोर अभाव है। बच्चे जर्जर भवन में ही पढ़ने को विवश है। कभी भी किसी प्रकार के अनहोनी घटित होने का डर बना रहा रहता है। छात्रों को बैठने के लिए बेंच तक की व्यवस्था नहीं है जबकि इस विद्यालय में पांच शिक्षक कार्यरत है। इस मामले ओंदा पंचायत के मुखिया सुबोध कुमार का कहना है कि इस संस्कृत विद्यालय को संवारने में शिक्षा विभाग को विशेष तौर पर नजर देना होगा तब कहीं जाकर यहां के बच्चों का भविष्य संवर सकता है। इसके लिए पूरे पंचायत के लोगों को जागरूक होकर इस समस्या के समाधान के लिए कदम उठाना होगा। वहीं, स्कूल के प्रभारी एचएम प्रभाकर रंजन बताते हैं कि इस विद्यालय के समकक्ष पंचायत में या प्रखंड में जितने विद्यालय है सभी को सरकारी मंजूरी मिल गई है। लेकिन इस संस्कृत विद्यालय को मंजूरी मिलना तो दूर रहा यहां के कार्यरत शिक्षकों को न तो नियमित किया जा सका और न ही समय पर वेतन ही दिया जा रहा है। बहुत प्रयास के बाद शिक्षा विभाग की ओर से बच्चों के लिए पोशाक और छात्रवृति की राशि का भुगतान किया जा रहा है ।

क्या कहते है बीडीओ : इस मामले में प्रखंड विकास पदाधिकारी पंकज कुमार का कहना है कि विद्यालय जर्जर होने की सूचना मिली है। इसकी जांच कर अग्रतर कार्रवाई के लिए जिला प्रशासन को पत्र प्रेषित किया गया है। जल्द ही समस्या का निराकरण किया जाएगा। विदित हो कि बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के कार्यकाल में जिले के हर पिछडे़ क्षेत्रों में संस्कृत विद्यालयों का जीर्णोद्धार किया गया था। लेकिन समय के कुचक्र में इन कार्यों पर भी ग्रहण लग गया है। अब इसकी भरपाई के लिए किसी मसीहा की तलाश है ।

Posted By: Jagran