नालंदा। बिहार सरकार के सात निश्चयों में शामिल स्वास्थ्य विभाग भी आता है। सरकार स्वास्थ्य विभाग को सुदृढ़ करने के लिए सभी तरह की व्यवस्था तो कर दी है। पर इसके चलाने वालों की प्रतिनियुक्ति नहीं होने से लाखों की लागत से खरीदी गई अल्ट्रासाउंड मशीन पिछले एक साल से सदर अस्पताल की शोभा बढ़ा रही है। पूर्व में पदस्थापित एक रेडियोलाजिस्ट के स्थानांतरण के बाद से अल्ट्रासाउंड के कमरे में ताला लगा दिया गया। आज पूरे एक साल होने को है लेकिन इसका पुरसाहाल लेने वाला कोई नहीं है। आज रेडियोलाजिस्ट के अभाव में लाखों की लागत से खरीदी गई अल्ट्रासाउंड मशीन धूल फांक रहा है। पिछले एक साल से स्वास्थ्य विभाग ने इस कमरे को खुलवा कर उसकी स्थिति के बारे में भी जानने की कोशिश नहीं की। इधर अल्ट्रासाउंड मशीन खराब रहने के कारण सबसे ज्यादा परेशानी गरीब व प्रसूति महिलाओं के समक्ष देखी जाती है। उन्हें इसकी जांच कराने के लिए निजी अल्ट्रासाउंड के यहां शरण लेनी पड़ती है। इससे मरीजों के पाकेट तो ढीली होती है उन्हें मरीज को बाहर ले जाने में भी परेशानी उठानी पड़ रही है। विभागीय सूत्रों की मानें तो स्वास्थ्य विभाग भी इस मामले में गंभीर नहीं है यही वजह है कि एक साल से बंद होने के बावजूद इस पर किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई नहीं हुई। एक साल में एक भी रेडियोलाजिस्ट की प्रतिनियुक्ति नहीं होना अपने-आप में अजूबा सा लगता है। अब सवाल यह उठता है कि यदि इस मशीन का उपयोग में लाना ही नहीं था तो फिर इतने रुपये खर्च कर इसे क्यों लगाया गया। इस तरह के कई सवाल लोगों के जेहन में पनप रहा है।

कहते हैं अधिकारी

अल्ट्रासाउंड मशीन चलाने के लिए एक रेडियोलाजिस्ट की जरूरत है। फिलहाल सदर अस्पताल में एक भी नहीं है। इस बाबत कई बार विभाग के वरीय पदाधिकारी को लिखित रूप से जानकारी देते हुए एक रेडियोलाजिस्ट की प्रतिनियुक्ति करने का आग्रह किया गया। बीच में एक रेडियोलाजिस्ट की सदर अस्पताल में प्रतिनियुक्ति भी हुई पर वह किसी कारण से अपना योगदान ही नहीं दे पाएं। नतीजन पिछले एक साल से अल्ट्रासाउंड का काम बंद पड़ा है। जब तक रेडियोलाजिस्ट की प्रतिनियुक्ति नहीं हो जाती तब तक इसे चालू नहीं किया जा सकता है।

डा. शैलेन्द्र कुमार उपाधीक्षक, सदर अस्पताल, बिहारशरीफ

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