संजीव कुमार, नालंदा/जमशेदपुर। मेरा बेटा पढ़ने में बहुत होनहार था। उसे यूपीएससी (UPSC) की तैयारी के लिए दिल्ली भेजा था और कोचिंग में दाखिला कराया था। एक दिन दिल्ली से उसका फोन आया- पापा, सिर में बहुत दर्द होता है और कुछ भी पढ़ता हूं तो याद नहीं रहता, भूल जाता हूं।
हमने सोचा कोई मामूली बात होगी, पास के डॉक्टर को दिखा लो। लेकिन जब एमआरआई (MRI) कराया तो होश उड़ गए... डॉक्टरों ने बताया कि उसे ब्रेन ट्यूमर है।
यह दर्दनाक दास्तान नालंदा जिले के थरथरी प्रखंड स्थित छोटी छरियारी गांव के रहने वाले पंकज कुमार की है। पंकज कुमार का 18 वर्षीय बेटा विपुल कुमार साल 2024 में कैंसर की चपेट में आया था।
बेटे को बचाने के लिए पंकज ने अपनी जमीन गिरवी रख दी। इलाज के लिए मुंबई के प्रसिद्ध हिंदुजा अस्पताल तक दौड़ लगाई। 25 लाख रुपये से ज्यादा खर्च हो गए, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वे अपने इकलौते होनहार बेटे को बचा नहीं सके।
बात करते-करते पंकज का गला भर आता है। लेकिन छोटी छरियारी गांव में यह कहानी सिर्फ पंकज कुमार की नहीं है। यह खौफ और बेबसी इस गांव के लगभग हर घर की चौखट पर दस्तक दे चुकी है।
16 साल में 25 से अधिक मौतें, 17 से 70 साल तक के लोग शिकार
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा के थरथरी प्रखंड मुख्यालय से महज 6 किलोमीटर और जिला मुख्यालय (बिहार शरीफ) से करीब 20 किलोमीटर दूर बसा है छोटी छरियारी गांव।
इस गांव में पिछले 16 सालों के भीतर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से 25 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। फिलहाल आधा दर्जन से अधिक लोग जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं।
गांव के लोग बताते हैं कि साल 2010 में गांव में कैंसर का पहला मामला सामने आया था। पेशे से किसान 70 वर्षीय शिवनारायण शर्मा इसके पहले शिकार बने थे।
परिजनों का कहना है कि शिवनारायण शर्मा को धूम्रपान या किसी तरह के नशा करने की आदत नहीं थी। उनके बाद शिवनारायण सिंह नाम के एक और ग्रामीण इस बीमारी की चपेट में आ गए।
इसके बाद से गांव में कैंसर फैलने का यह सिलसिला थमा नहीं है। सबसे डरावनी बात यह है कि यहां 17 साल के युवाओं से लेकर 70 साल के बुजुर्गों तक को कैंसर अपनी जद में ले रहा है।
आसपास के गांवों में सब सामान्य, फिर सिर्फ छरियारी ही क्यों?
हैरानी और चिंता की बात यह है कि कैंसर का यह प्रकोप सिर्फ और सिर्फ छोटी छरियारी गांव तक ही सीमित है। इसके आसपास स्थित अन्य गांवों में कैंसर का ऐसा कोई फैलाव देखने को नहीं मिल रहा है।
गांव के शिक्षक श्याम शुक्ल शर्मा (गुरुजी) बताते हैं कि गांव में दहशत का माहौल है। बीमार होने के बाद हर व्यक्ति के मन में यही डर रहता है कि कहीं जांच में कैंसर न निकल आए।
यह बीमारी केवल हमारे गांव में ही तेजी से फैल रही है, आसपास के किसी गांव में यह समस्या नहीं है। हमें आशंका है कि कहीं गांव के पानी या मिट्टी में कोई ऐसा विषैला तत्व तो नहीं है जो कैंसर को बढ़ावा दे रहा हो।
ग्रामीणों को शक है कि गांव के पानी या मिट्टी में भारी धातु या रासायनिक प्रदूषण हो सकता है, जिसके कारण लोग लगातार गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।
कैंसर के बढ़ते मामलों से खौफजदा ग्रामीणों ने समस्या के समाधान के लिए हर दरवाजा खटखटाया है। गांव के लोग एकजुट होकर सांसद कौशलेंद्र कुमार से मिले और गांव की मिट्टी व पानी की जांच कराने की मांग की।
सांसद ने ग्रामीणों को ढाढस बंधाया और सिविल सर्जन से मिलने की सलाह दी। इसके बाद ग्रामीणों का एक प्रतिनिधिमंडल नालंदा के सिविल सर्जन से मिला।
ग्रामीणों ने पूरी स्थिति से अवगत कराते हुए स्वास्थ्य कैंप लगाने और मिट्टी-पानी का सैंपल लेकर लैब में जांच कराने का आग्रह किया। सिविल सर्जन ने आश्वासन भी दिया था कि जल्द ही स्वास्थ्य विभाग की टीम गांव जाएगी और जांच शुरू करेगी।
लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि सालों बीत जाने के बाद भी आज तक स्वास्थ्य विभाग की कोई टीम गांव नहीं पहुंची है। ग्रामीण रोज इसी खौफ में जीते हैं कि कल किसकी बारी होगी?
जब इस पूरे मामले पर नालंदा के सिविल सर्जन से बात की गई तो उन्होंने कहा कि बहुत जल्द स्वास्थ्य विभाग की एक विशेष टीम को छोटी छरियारी गांव भेजा जाएगा।
जब उनसे सवाल किया गया कि आखिर इसी गांव में कैंसर इतनी तेजी से क्यों फैल रहा है और क्या मिट्टी या पानी में कोई हानिकारक तत्व मौजूद हैं, तो उन्होंने कहा कि यह तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा। कुछ मामलों में कैंसर वंशानुगत (Genetic) भी होता है। इसलिए बिना वैज्ञानिक जांच के किसी भी नतीजे पर पहुंचना सही नहीं होगा।
प्रशासन से आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं ग्रामीण
छोटी छरियारी गांव के लोग आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि प्रशासन नींद से जागेगा, स्वास्थ्य विभाग की टीम यहांं आकर पानी और मिट्टी के सैंपल लेगी और सही वजहों का पता लगाएगी।
जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक इस गांव के हवा-पानी में घुला खौफ हर दिन एक नए परिवार की नींद उड़ाता रहेगा। ग्रामीणों के अनुसार, बीमारी के कारण असमय मरने वाले और वर्तमान में जूझ रहे लोगों की सूची लंबी होती जा रही है।
ग्रामीण विजय नारायण बताते हैं कि उनके दो बड़े भाइयों शिव नारायण शर्मा और जय नारायण शर्मा की कैंसर के कारण मौत हो चुकी है। उन्होंने कहा कि गांव में कैंसर के लगातार सामने आ रहे मामलों को लेकर लोगों में डर का माहौल है। ग्रामीण इस बात को लेकर चिंतित हैं कि आखिर इस बीमारी की वजह क्या है।
विजय नारायण का कहना है कि सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल ध्यान देना चाहिए। गांव में जल्द से जल्द मेडिकल टीम भेजी जानी चाहिए, जो लोगों की जांच करने के साथ ही कैंसर के मामलों के पीछे संभावित कारणों का पता लगाए। इससे ग्रामीणों की चिंता दूर करने और बीमारी की वास्तविक वजह समझने में मदद मिल सकेगी।
हाल के वर्षों में कैंसर से जान गंवाने वाले ग्रामीण:
- शिवनारायण सिंह (60 वर्ष)
- नरेश सिंह (50 वर्ष)
- जय नारायण सिंह (55 वर्ष)
- दामोदर सिंह (45 वर्ष)
- नवल सिंह (35 वर्ष)
- मंजू देवी (60 वर्ष)
- श्याम किशोर शर्मा (32 वर्ष)
- विपुल कुमार (18 वर्ष)
- राजकुमारी देवी (60 वर्ष)
- भोला सिंह (20 वर्ष)
- ललन शर्मा (55 वर्ष)
- प्रवीण शर्मा (45 वर्ष)
- अजय शर्मा (55 वर्ष)
- शैलेश रावत (45 वर्ष)
- मुरारी शर्मा (55 वर्ष)
- संजय शर्मा (50 वर्ष)
- अवधेश शर्मा (70 वर्ष)
वर्तमान में कैंसर से जूझ रहे लोग:
- राजकुमार शर्मा (70 वर्ष)
- मनोरमा देवी (40 वर्ष)
- गुड्डू कुमार (35 वर्ष)
- पंचवती देवी (70 वर्ष)