मुजफ्फरपुर, जेएनएन। भारतीय संस्कृति में हर पर्व का विशेष महत्व है और जब बात दीपावली की हो तो रंगोली और घरौंदा बनाए जाने की परंपरा सदियों पुरानी है। मान्यता है कि यह सुख-समृद्धि का प्रतीक है। कार्तिक महीना शुरू होते ही घरों में घरौंदे का बनना भी शुरू हो जाता है।

आमतौर पर अविवाहित लड़कियां घरौंदा बनाती हैं, ताकि उनका घर भरापूरा रहे। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान राम चौदह साल के वनवास के बाद कार्तिक अमावस्या के दिन अयोध्या लौटे, तब उनके आगमन की खुशी में नगरवासियों ने घरों में घी के दीपक जलाकर उनका स्वागत किया। उसी समय से दीपावली मनाए जाने की परंपरा चली आ रही है। नगरवासियों का मानना था कि श्रीराम के आगमन से ही उनकी नगरी फिर बसी है। इसी को देखते हुए लोगों में घरौंदा बनाकर उसे सजाने का प्रचलन हुआ।

     घरौंदे को सजाने के लिए अविवाहित लड़कियां उसमें दीये, मिठाई आदि भरती हैं। मान्यता है कि भविष्य में वह जब कभी भी दांपत्य जीवन में जाएगी, तो उनका संसार भी सुख-समृद्धि से भरा रहेगा। दिलचस्प बात यह है कि घरौंदों में रखे गए अन्न का प्रयोग वह खुद नहीं करती, अपने भाई को खिलाती है। इसके पीछे मान्यता यह है कि घर की रक्षा और उसका भार वहन करने का दायित्व पुरुष अपने कंधे पर रखता है।

आमतौर पर घरौंदा मिट्टी से बनाया जाता है, लेकिन बदलती जीवनशैली मे अब इसका निर्माण लकड़ी, कागज के गत्ते व थर्मोकोल आदि से भी किया जा रहा है।

  बाजार में सामान्य तौर पर 100 से 500 रुपये में घरौंदा मिल रहा है। घरौंदे के साथ खेलना लड़कियों को काफी पसंद होता है। वे इसे ऐसे सजाती हैं, जैसे वह उनका अपना घर हो। घरौंदे के चारों तरफ रंग-बिरंगे सुंदर दीयों का इस्तेमाल भी किया जाता है। इसकी मुख्य वजह है कि इससे उनके घर में अंधेरा नहीं हो, रोशनी कायम रहे। 

Posted By: Ajit Kumar

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