मुजफ्फरपुर । विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत की है। डॉलर का मजबूत होना ही बाकी करेंसियों के कमजोर होने की वजह है। यह सिर्फ भारतीय रुपये के साथ नहीं, बल्कि लगभग सभी देशों के साथ है। यह कहना है सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के वरीय क्षेत्रीय प्रबंधक एके मिश्रा का। 'गिरता रुपया कितना हानिकारक' विषय पर आयोजित विमर्श में उन्होंने यह बात कहीं।

रुपये के मूल्य में गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह है कि पिछले कुछ सालों में अमेरिका आर्थिक सुस्ती से गुजरा है। कुछ लोग इसे मंदी भी कहते हैं। अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने नोट छापने शुरू कर दिए, ताकि अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति बढ़ाई जा सके। इसका एक असर यह भी हुआ कि डॉलर की कीमत कम हो गई। लेकिन, इस साल के शुरू में जब अर्थव्यवस्था ने वापसी के संकेत दिए, तो फेडरल रिजर्व ने बाड खरीदने का सिलसिला रोक दिया। इसका अर्थ था बाजार में डॉलर की आपूर्ति का पहले के मुकाबले कम हो जाना। इससे डॉलर की कीमत बढ़ने लगी, जिसकी वजह से वैश्विक निवेशक उन देशों के बाजारों को छोड़ने लगे, जहा की मुद्रा कमजोर है। भारत और दूसरे विकासशील देश इसका शिकार बने। भारत में निवेश करनेवाले वैश्विक फंड तुरंत अमेरिका के मजबूत बाजार की ओर रुख करने लगे। आयात के लिए करना पड़ता

अधिक खर्च : रुपये के मूल्य में गिरावट से आयात पर हमें अधिक खर्च करना पड़ता है, जिसकी वजह से महंगाई बढ़ जाती है। रुपये की कीमत के गिरने का यह हम पर पड़नेवाला अकेला असर नहीं है। सब्जी, अनाज, मीट, मछली वगैरह जो भी चीजें हम खाते हैं, वे जिन मालवाहक वाहनों पर आते हैं, उन्हें डीजल और पेट्रोल की जरूरत पड़ती है। इसका असर माल भाड़े पर पड़ता है, जिससे इन सब चीजों की कीमत बढ़ जाती है। कच्चे माल का आयात महंगा हो जाता, उसकी लागत बढ़ जाती है। मोबाइल फोन, टैबलेट, कंप्यूटर और लैपटॉप भी आपको महंगे मिलेंगे, क्योंकि इनके ज्यादातर सामान आयात होते हैं। जो लोग विदेशों में पढ़ रहे हैं या पढ़ने जाना चाहते हैं, उन्हें भी अब रुपये की कीमत गिरने के कारण ज्यादा खर्च करना होगा। रुपये के कमजोर होने

के प्रमुख कारण

-अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना।

-कच्चे तेल के दामों में हो रही लगातार वृद्धि।

-विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से अपना पैसा वापस निकालना।

-अमेरिका द्वारा शुरू किया गया ट्रेडवार आदि। रुपये की हालत बिगड़ने पर आरबीआइ की यह होती पहल

जब भी रुपये की हालत बिगड़ती है, भारतीय रिजर्व बैंक वायदा बाजार में उतरता है और दो तरीकों से डॉलर बेचता है। पहला स्पॉट मार्केट के जरिए और दूसरा फ्यूचर्स मार्केट के जरिए। स्पॉट यानी अभी के मार्केट में और फ्यूचर्स यानी आगामी सप्ताह या महीने के मार्केट में। डॉलर को बेचने से पैसा आता है और रुपये की हालत मजबूत होती है। इस बार भी जब रुपये की हालत बिगड़ी और वह डॉलर के मुकाबले 69 के आकड़े को पार कर गया तो आरबीआइ ने स्पॉट मार्केट और फ्यूचर्स मार्केट दोनों में चार-पाच सौ मिलियन डॉलर बेचा, जिससे रुपया 25-26 पैसा मजबूत हुआ। रुपये की खराब हालत की स्थिति में आरबीआइ के पास यही उपाय है कि वह इन दो तरीकों के जरिए रुपये को मजबूत करे।

Posted By: Jagran