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मुजफ्फरपुर, जेएनएन। बीसवीं सदी की शुरुआत में यह कल्पना भी नहीं की गई थी कि कभी देवनागरी लिपि में कालजयी कृतित्व रची जा सकती है। इस कल्पना को साकार करने वाले अयोध्या प्रसाद खत्री रहे, जिन्होंने 1857 के गदर के बाद ङ्क्षहदी की ऐसी अलख जगाई कि दुनिया में उनका नाम फैल गया। उनके खड़ी बोली में ङ्क्षहदी कविता आंदोलन का परिणाम हुआ कि 1903 में वाराणसी में नागरी प्रचारिणी सभा में खड़ी बोली में कविता लिखने का प्रस्ताव पास हो गया तो खत्री का यह योगदान आज भी देश में चर्चा का विषय रहा है। उसका श्रेय ङ्क्षहदी सेवी वीरेन नंदा को जाता है। 

 नंदा ने वर्ष 2008 से अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान समारोह की शुरुआत की थी, जो निरंतर प्रतिवर्ष नवंबर में आयोजित होता है। इसमें देश के सर्वाधिक चर्चित साहित्यकार को सम्मानित किया जाता है।

बैंक पदाधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए वीरेन नंदा की साहित्यिक पृष्ठभूमि रही है। लेकिन, हिंदी के एक महान विभूति को लेकर जागरूकता फैलाने की प्रेरणा दिलचस्प प्रसंग से है। उनकी बेटी को कक्षा में जब यह पढ़ाया गया कि चंद्रकांता संतति के लेखक अयोध्या प्रसाद खत्री हैं, तो उनको बेहद आश्चर्य हुआ। यह सोचा कि जब इतने लोकप्रिय उपन्यास लेखक जिनका जन्म जिले में हुआ, उनके बारे में सही जानकारी नहीं है। संकल्प लिया कि हिंदी समाज को जागरूक करेंगे।

 1998-99 से उन्होंने अयोध्या प्रसाद खत्री के हिंदी भाषा में योगदान पर शोध शुरू किया। कोलकाता, वाराणसी के अलावा यहां नगर निगम लाइब्रेरी में भी उनकी किताबों की जानकारी ली। अयोध्या प्रसाद खत्री की प्रमुख कृति खड़ी बोली का पद्य पहले व दूसरे भाग का संपादन 2008 में सामग्री जुटाकर वीरेन नंदा ने किया था।

Posted By: Ajit Kumar

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