सीतामढ़ी, [चंद्रकिशोर सक्सेना]। सुरसंड का रानी स्वर्ण मंदिर इतिहास के कई अनछुए पहलुओं को अपने में समेटे है। इसके बारे में जानने की उत्सुकता आज भी लोगों को होती है। इस मंदिर को बारे में कई किस्से-कहानियां हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर को बनाने वाले कारीगरों के हाथ कटवा दिए गए थे। हालांकि इसके दस्तावेज नहीं हैं। गुफा, रात के अंधेरे में निकली रोशनी के बीच गूंजती पायल की झंकार, तहखाना, सीढी़, कबूतर, विषैले सर्प अभी भी रहस्य के घेरे में हैं। मंदिर की ईंट वाली दीवार के गुंबद आदि की नक्काशी अद्भुत है। रात में निकलनेवाली पायल की झंकार दो किलोमीटर दूर तक सुनाई पड़ती है। लोगों की मानें तो यह आवाज रानी राजवंशी कुंवर की है।

कुछ चीजें ताजमहल से मिलती-जुलती

पांचवें मुगल शहंशाह शाहजहां अपनी न्यायप्रियता और वैभवविलास के कारण अपने काल में बड़े लोकप्रिय रहे। किन्तु इतिहास में उनका नाम केवल इस कारण नहीं लिया जाता। शाहजहां का नाम एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर लिया जाता है जिसने अपनी बेग़म मुमताज के लिए विश्व की सबसे खूबसूरत इमारत ताजमहल बनाया। और यह इमारत विश्व धरोहर में शामिल होकर दुनिया का सातवां आश्चर्य बन गई। करीब डेढ़ एकड़ भूमि में निर्मित इस मंदिर की कुछ चीजें भी ताजमहल से मिलती-जुलती हैं। मंदिर निर्माण के बाद निर्माता रानी राजवंशी कुंवर ने चार मजदूरों के हाथ कटवा दिए ताकि ऐसा मंदिर कहीं नहीं बन सके। रानी ने ताउम्र उन मजदूरों के परिवारों की परवरिश राजकोष से कराई। मंदिर की पिछली दीवार पर उक्त मजदूरों की प्रतिमाएं इसकी गवाह हैं। यह मंदिर अब केवल रानी मंदिर रह गया है। कारण मंदिर के स्वर्ण मुकुट समेत स्वर्ण धातुओं की या तो चोरी हो गई या फिर दबंगों के कब्जे में है।

 

विरासत को सहेजने की नहीं दिखती चिंता

मंदिर की अकूत संपत्ति की चर्चा हर जुबान पर है। यहां तहखाने के भीतर जाने पर लौटना मुमकिन नहीं। अंदर जाने वाले विषैले सर्प के शिकार बन जाते। नेपाल से प्रकाशित एक पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि वर्ष 1896 में राजस्थान के स्वामी रामेश्वर दास की यहां सर्पदंश से मौत हो गई। मंदिर की एक सीढी के नीचे और एक ऊपर आने तथा दोनों के परस्पर मिलकर नया रास्ता बनाने की बात भी समझ से परे है। वर्ष 2007 में पूर्व पंचायत के मुखिया शोभित राऊत व पूर्व सरपंच गोपाल बारिक ने कार सेवा के जरिए इसके जीर्णोद्धार की पहल की। बहरहाल, मंदिर का पुनरुद्धार करने व इसके रहस्यों से पर्दा हटाने की दरकार है। ताकि, पर्यटको का ध्यान खींचा जा सके।

 

पांच विशाल गुंबद वाला यह मंदिर

कुछ लोग मंदिर को रामायण काल का बताते हैं। इतिहासकारों की नजर में यह मंदिर सुरसंड राज दरबार का है। ढाई सौ वर्ष पूर्व महारानी राजवंशी कुंवर ने पांच विशाल गुंबद वाले 70 फीट ऊंचे मंदिर का निर्माण कराया। वर्ष 1759 में स्थापित इस मंदिर में राम जानकी समेत कई देवी देवताओं की दुर्लभ स्वर्ण मूर्तियां स्थापित कराई गई थी। मंदिर को रानी की विरासत के तौर देखा जाता है। वर्ष 1942 में भूकंप के चलते मंदिर के कई गुंबद धराशायी हो गए। 1987 में दूसरी भूकंप ने मंदिर की बची खुची बुनियाद भी हिला दी। बाद में मंदिर ध्वस्त होता गया और लोग भूलते गए।

ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व की धरती सीतामढ़ी को नहीं मिल पाया वो महत्व

ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व की धरती सीतामढ़ी को आजादी के इतने सालों बाद भी जो महत्व मिलना चाहिए नहीं मिल सका है। प्रख्यात शिक्षाविद् डाॅ. आनंद किशोर बताते हैं कि सुरसंड प्रखण्ड में बाबा मानेश्वरनाथ का मंदिर, रीगा प्रखंड के अन्हारी अवस्थित प्रशिद्ध पुरातन कालीन शिव मंदिर का विशेष महत्त्व है। रून्नीसैदपर के गाढ़ा स्थित काली मंदिर के बारे में किवदंती है कि उसकी स्थापना राजा शिवसिंह ने की थी तथा उस देवी मंदिर में विद्यापति व महाशय जी जैसे प्रसिद्ध संतों ने तपस्या की है।

 सीतामढी शहर के बीच अवस्थित सनातन धर्म पुस्तकालय जिसकी स्थापना वर्ष 1925 बताई जाती है। जिससे राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार कवि तथा राजनीतिज्ञों का लगाव रहा है। इस प्रकार इन पुरातन ऐतिहासिक धरोहरों के अतिरिक्त जिले में डुमरा चौक स्थित ऐतिहासिक पावन जैन मंदिर जिला तथा राज्य की विरासत है।उपरोक्त विरासतों मे से कुछ का विकास हुआ भी है। कुछ उपेक्षा तथा कुछ व्यक्तिगत लाभ में इस्तेमाल हो रहा है। जरूरत है विरासत पर एकमुश्त सोचने, सजाने-संवारने और राष्ट्रीय क्षितिज पर उसकी पहचान दिलाने की।

अयोध्या की तरह सीतामढ़ी को नहीं मिल रहा महत्व

आज हिन्दू धर्म में सीता और राम की महता विश्व प्रसिद्ध है। परंतु राम के अयोध्या की तुलना में माता सीता की भूमि सीतामढ़ी का तीर्थस्थल के रूप में विकास व पर्यटकीय महत्व नहीं मिल सका है। पुनौरा धाम जानकी मंदिर, सीतामढ़ी जानकी मंदिर, उर्विजा कुंड और इससे जुडे़ हलेश्वर स्थान, पंथपाकड़ हमारा पुराना ऐतिहासिक धरोहर है, जिसका राष्ट्रीय महत्व है। इसी प्रकार लक्ष्मणा किनारे अवस्थित सीतामढ़ी शहर में ही प्रसिद्ध सिद्ध बाबा की बड़ी कुटी, छोटी कुटी, रामानंद आश्रम तथा श्री सियालालशरण जी प्रेमलता जी द्वारा स्थापित सद्गुरू निवास पीली कुटी का विशेष ऐतिहासिक महत्व है।

 परंतु ये धार्मिक स्थल उपेक्षा के शिकार हैं। इसी बीच मे अवस्थित उदासीन सम्प्रदाय का श्री विचार दास का मठ भी अवस्थित है, जो श्री गुरूचन्द्र जी महाराज से जुडा हुआ मठ है। शहर के मध्य से बहती सीता की सहेली के रूप में प्रशिद्ध लक्ष्मणा नदी का ऐतिहासिक तथा आध्यात्मिक महत्व है। जिसकी धारा बंद होने से तीन दशक से प्रवाह बाधित है। लखनदेई बचाओ संघर्ष समिति द्वारा उद्धार के प्रयास का अंतिम चरण कोरोना संकट से बाधित हुआ है। इसी प्रकार भारत-नेपाल सीमा पर मडपा-बसबीट्टा अवस्थित बाबा शुकेश्वरनाथ मंदिर जिसके बारे में कहते हैं कि इसकी स्थापना शुकदेव मुनि ने राजा जनक से मिलने जाने के क्रम में बागमती किनारे रुकने पर की थी।

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