मुजफ्फरपुर। सौभाग्य से जुड़ा हरितालिका तीज का व्रत स्त्रियों और कुंवारी कन्याओं द्वारा किया जाता है। इस पावन व्रत में भगवान शिव, माता गौरी एवं गणेश जी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना व साधना-अराधना का बड़ा महत्व है। यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता है। सुहाग के सौभाग्य या फिर एक बेहतर जीवनसाथी की कामना के लिए किए जाने वाले इस व्रत का इंतजार स्त्रियां महीनों पहले से करने लगती हैं। हरतालिका तीज का महत्व

इस व्रत को हरितालिका तीज भी कहते हैं। इस व्रत का संबंध भगवान शिव से है।'हर'शिव का नाम है, इसलिए इस व्रत का नाम हरतालिका तीज ज्यादा उपयुक्त माना गया है। यह व्रत भाद्रपद शुक्ल की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं निर्जल व्रत रखने का संकल्प लेती हैं। मुख्य रूप से यह पर्व मनचाहे और योग्य पति की कामना के लिए महिलएं रखती है। हालांकि कोई भी स्त्री इस व्रत को रख सकती है। इस बार हरितालिका तीज 12 सितंबर को मनाई जाएगी। इस व्रत को लेकर मान्यता ये भी है कि भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए मां पार्वती ने वर्षों तक जंगल में घोर तपस्या की। बिना जल और बिना आहार के तप करने के बाद उन्हें भगवान शिव ने पत्नी रूप में स्वीकार किया था। इसीलिए हरितालिका तीज के दिन महिलाएं निष्ठा और तपस्या को विशेष महत्व देती हैं। तीज व्रत की उत्तम विधि और कैसे मिलता है इस व्रत का पूर्ण फल

सुबह संकल्प लेकर निर्जल उपवास रखना चाहिए। लेकिन सेहत ठीक ना हो तो फलाहार पर भी व्रत रख सकते हैं। शाम को भगवान शिव और पार्वती की संयुक्त उपासना करें। इस दिन पूजन के समय स्त्रियों को संपूर्ण श्रृंगार करना चाहिए। इसके बाद मां पार्वती को सौभाग्य की वस्तुएं अर्पित कर उनसे अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रार्थना करना चाहिए। विवाहिता स्त्रियों को इस दिन अपनी सास को सौभाग्य की वस्तुएं देकर उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए। भगवान शिव और मां पार्वती की संयुक्त उपासना करने के बाद ही इस व्रत का पारायण करें। हरतालिका तीज के दिन रात्रि जागरण करना विशेष शुभकारी होता है। कब किया जाता है यह व्रत

हरितालिका तीज का व्रत भाद्रपद शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को हस्त नक्षत्र में दिनभर का निर्जल व्रत रह किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव के लिए रखा था। इस व्रत में भगवान शिव-पार्वती के विवाह की कथा सुनने का बड़ा महत्व है। कैसे करें पूजन

प्रात: उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर एक चौकी पर रंगीन वस्त्रों के आसन बिछाकर शिव और पार्वती की मूर्तियों को स्थापित करें। साथ ही इस व्रत का पालन करने का संकल्प लें। संकल्प करते समय अपने समस्त पापों के नाश की प्रार्थना करते हुए कुल, कुटुम्ब एवं पुत्र पौत्रादि के कल्याण की कामना बेहतर होगा। आरंभ में श्री गणेश का विधिवत पूजन करें। गणेश पूजन के पश्चात् शिव-पार्वती का आवाहन, आसन, पाद्य, अ‌र्घ्य, आचमनी, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, दक्षिणा तथा यथाशक्ति आभूषण आदि से पूजा करना चाहिए। पूजन के पश्चात क्या करें

पूजन की समाप्ति पर पुष्पांजलि चढ़ाकर आरती, प्रदक्षिणा और प्रणाम करें। फिर कथा श्रवण करें। कथा के अंत में बांस की टोकरी या डलिया में मिष्ठान्न, वस्त्र, पकवान, सौभाग्य की सामग्री, दक्षिणा आदि रखकर आचार्य पुरोहित को दान करें। पूरे दिन और रात में जागरण करें और यथाशक्ति ओम नम: शिवाय का जप करें। दूसरे दिन और प्रात: भगवान शिव-पार्वती का व्रत का पारण होगा।

पूजा सामग्री का बाजार मूल्य

सामान राशि

झितनी 20 रुपये पीस

मेंहदी 10-15 रुपये पीस

श्रृंगार सामान 100 से 300 रुपये प्रति सेट

नारा 05 रुपये

डारा 10 रुपये

चना-चावल 10 रुपये पैकेट

सेव 70 से 90 रुपये किलोग्राम

खीरा 10 रुपये पीस

केला 30 से 50 दर्जन

मक्का 20 रुपये जोड़ा

अनार 80 रुपये किलोग्राम

Posted By: Jagran