मखाना के लिए नया मार्केट: बौद्ध देशों में निर्यात की अनुकूलता तलाशेगा पूसा केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय
Makhana Export Policy Bihar: पूसा कृषि विश्वविद्यालय बौद्ध अनुयायी देशों में मखाना निर्यात की संभावनाएं तलाश रहा है। इसका उद्देश्य ...और पढ़ें

दरभंगा के बेनीपुर में पोखर में लगाया गया मखाना व गौड़ाबौराम प्रखंड की कसरौड़ करकौल पंचायत के जिरात गांव में लावा तैयार करते किसान। फोटो: जागरण

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अजय पांडेय, मुजफ्फरपुर। Pusa Agriculture University Makhana: बौद्ध अनुयायी देशों से बिहार का भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाने के लिए मखाना निर्यात पालिसी विकसित की जा रही है।
इसके लिए समस्तीपुर के पूसा स्थित डा. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए), राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) व सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) मिलकर काम कर रहे हैं।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा में मखाना निर्यात पर आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित विभिन्न संस्थाओं के अधिकारी व कुलपति। सौ. पूसा विश्वविद्यालय
निर्यात की अनुकूलता
पहले चरण में इन संस्थानों के विज्ञानी और प्रतिनिधि अधिकारी थाईलैंड, कंबोडिया, म्यांमार, भूटान, श्रीलंका, लाओस जैसे देशों में मैपिंग सर्वे करेंगे। वहां निर्यात की अनुकूलता और बाजार की संभावना देखेंगे।
इनकी रिपोर्ट पर विस्तृत प्रस्ताव राज्य और केंद्र को भेजा जाएगा। बीते 14 अगस्त को कृषि विश्वविद्यालय में कुलपति डा. पीएस पांडेय की अध्यक्षता में इसका प्रारूप तय किया गया।
अभी यूरोप व अरब का बाजार
ज्ञात हो कि हाल ही में सात टन कनाडा, 18 टन आस् ्रेलि ा व चार टन दुबई फ्लेवर्ड मखाना भेजा गया था। कुलपति का कहना है कि अभी यूरोपीय और अरब देशों को सर्वाधिक मखाने का निर्यात होता है, लेकिन अब मखाना उत्पादकों को संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ेंगे।
इसमें भी बौद्ध अनुयायी देश प्राथमिकता में हैं, क्योंकि वहां निर्यात की अच्छी संभावनाएं हैं। बुद्ध की धरती होने के कारण बौद्ध देशों के लोग भावनात्मक रूप से बिहार से जुड़े हैं।
यहां की संस्कृति से प्रभावित होते हैं। इसके लिए इन देशों में मांग की मैपिंग की जरूरत है। हमारा लक्ष्य अगले दो-तीन वर्षों में बिहार के मखाना निर्यात को तीन गुना करना है।
20 विज्ञानियों की टीम करेगी काम
मैपिंग से लेकर निर्यात प्रक्रिया तक में कृषि विश्वविद्यालय के 20 विज्ञानियों की टीम काम करेगी। इसमें मखाने की खेती से लेकर पैकेजिंग विभाग तक के विज्ञानी शामिल हैं। मखाने की गुड़ी (बीज) निकालने से लेकर कीट-रोग की निगरानी, लावा और प्रमाणीकरण के बाद पैकिंग की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
नए बाजार की पहचान
इसके लिए विश्वविद्यालय में स्कूल आफ एग्री-बिजनेस एंड रूरल मैनेजमेंट की वरीय विज्ञानी डा. ऋतंभरा को नोडल अधिकारी बनाया गया है। एपीईडीए निर्यात के लिए आवश्यक प्रमाणीकरण, बाजार लिंकेज और अंतरराष्ट्रीय मेले में भागीदारी में सहयोग करेगा। चयनित देशों में मखाने के लिए नए बाजार की पहचान में सहयोग करेगा।
निर्यात से पहले प्रमाणीकरण
नए बाजार में मखाना निर्यात से पहले उसका प्रमाणीकरण होगा। खेत/तालाब के साथ ही गुड़ी व लावा मेकिंग तथा पैकिंग प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए जियो फेंसिंग की जाएगी। इससे मखाने के मूल स्थान और बाकी की प्रक्रिया आन रिकार्ड होगी।
नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक गौतम कुमार सिंह का कहना है कि संस्थान मखाना किसानों और उद्यमियों को वित्तीय सहायता, क्लस्टर विकास और मूल्य संवर्धन के लिए हरसंभव मदद देगा। एमएसएमई के निदेशक राकेश कुमार चौधरी कहते हैं कि आधुनिक प्रोसेसिंग यूनिट और पैकेजिंग तकनीक उपलब्ध करा मखाना की वैल्यू चेन मजबूत कर सकते हैं।
