यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 22, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Positive India: बेतिया में शिक्षा की अलख जगा रहीं बनारस की बेटी, बच्चों को दे रहीं ऑनलाइन शिक्षा
West Champaran वाराणसी लंका घाट धन्वन्तरि नगर निवासी स्व. कैलाश नाथ पाठक की पुत्री डॉ. अनुराधा पाठक बेतिया के एमजेके ...और पढ़ें

प. चंपारण, [संदेश तिवारी] । कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों... दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों को बनारस की एक बेटी चरितार्थ कर रही है। वाराणसी लंका घाट धन्वन्तरि नगर निवासी स्व. कैलाश नाथ पाठक की पुत्री डॉ. अनुराधा पाठक बेतिया के एमजेके कॉलेज में दर्शन शास्त्र की व्याख्याता हैं। अपनों से दूर अकेली बेतिया में रहतीं हैं। कोरोना वैश्विक महामारी की वजह से कॉलेज बंद है। फिर भी बेतिया में रहकर डॉ. अनुराधा बच्चों को आनलाइन शिक्षा दे रही हैं। ग्रामीण परिवेश में उच्च शिक्षा की वर्षों पुरानी परंपरा को बदलने की कोशिश में लगी हैं। जहां कॉलेज में नामांकन कराने के बाद छात्र कभी कक्षा व पुस्तकों से सरोकार नहीं रखते थे, वहीं अब छात्र सिलेबस में पिछड़ नहीं जाएं, इस वजह से आनलाइन शिक्षा ले रहे हैं। डॉ अनुराधा बताती हैं कि एमजेके कॉलेज में 70 छात्रों का नामांकन दर्शन शास्त्र में है। प्रतिदिन 55- 60 छात्र आनलाइन कक्षा में जुड़कर शिक्षा ले रहे हैं। हालांकि उन्होंने आनलाइन कक्षा की शुरुआत मार्च 2020 में की थी। उस समय से इसे अनवरत जारी रखा है। बीच में कुछ दिनों के लिए इसे डाउट क्लास बना दिया था। छात्रों को कोई परेशानी होती थी तो वे सुबह आठ से दस कक्षा ज्वाइन करते थे। अभी प्रतिदिन दो घंटे की आनलाइन कक्षा चला रहीं है।
तीन वर्ष में बदल दी कॉलेज की परंपरा
डॉ अनुराधा ने वर्ष 2017 में एमजेके कॉलेज बेतिया में दर्शन शास्त्र के व्याख्याता के पद पर योगदान किया था। उस वक्त महाविद्यालय में दर्शन शास्त्र में एक भी छात्र का नामांकन नहीं थी। जहां छात्र हीं नहीं थे, वहां व्याख्याता का कोई मतलब नहीं था। किस तरह से तीन माह का वक्त गुजारा। नए नामांकन के लिए सत्र आरंभ हुआ। उन्होंने नामांकन कराने के लिए आने वाले छात्रों को दर्शन शास्त्र की अहमियत बताई तो किसी तरह से 15 छात्रों ने नामांकन कराई। फिर उन्होंने विषय को रोचक बनाकर छात्रों को पढ़ाना आरंभ किया। फिलहाल महाविद्यालय में 70 छात्र नामांकित हैं। डॉ अनुराधा को बेहतर शोघ पत्र के लिए अखिल भारतीय दर्शन परिषद द्वारा पुरस्कृत किया गया चुका है। अब तक दो दर्जन से अधिक इनके शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं।
छात्रों को समाजसेवा के लिए करतीं जागरूक
डॉ. अनुराधा राष्ट्रीय सेवा योजना(एनएसएस) की पदाधिकारी भी हैं। राष्ट्र की युवाशक्ति के व्यक्तित्व विकास के लिए सक्रिय रहती हैं। पिछले वर्ष कोरोना विपदा में छात्रों को प्रोत्साहित कीं। विपदा के वक्त में छात्रों ने अपने आस पड़ाेस के लोगों की मदद भी की। उनका कहना है कि विद्यार्थी जीवन से ही समाजपयोगी कार्यों में रूचि रही है। कोरोना की दूसरी लहर में भी लोगों को हरसंभव मदद पहुंचाने की योजना पर विचार चल रहा है।
संघर्षों से तपकर बनीं कुदंन
डॉ. अनुराधा के पिता कैलाश नाथ पाठक शिक्षक थे। माता स्व. मालती देवी गृहिणी थी। पांच बहन और एक भाई में अनुराधा सबसे छोटी हैं। चार बड़ी बहनों की पढ़ाई और शादी में अनुराधा के पिता की आर्थिक स्थिति चरमरा गई थी। लेकिन बचपन से पढ़ने में मेधावी अनुराधा को उनके पिता उच्च शिक्षा देकर कॉलेज में प्राध्यापक बनाना चाहते थे। बीएचयू से पीएचडी करने के बाद डॉ. अनुराधा ने 2017 में व्याख्याता बनकर पिता के अरमान को पूरा किया। उसी वर्ष नवंबर में उनके पिता का देहांत हो गया। जून 2018 में अनुराधा की मां भी स्वर्ग सिधार गईं। बड़ा भाई मिर्जापुरा के गांव में किसान हैं। उनका कहना है कि माता- पिता के प्रोत्साहन व संघर्ष से प्रेरणा मिली और कामयाबी हासिल की।
