मुजफ्फरपुर, [प्रमोद कुमार]। शहर के पानी में ही सियासत है। यहां विकास नहीं विवाद चाहिए। काम करने वाले अधिकारी यहां टिक नहीं सकते। उदाहरण सामने है। शहर को स्मार्ट बनाने में लगे युवा अधिकारी पर सियासत भारी पड़ रही है। युवा अधिकारी का संबंध शहर के सफाई महकमे से है। जब से आए हैैं शहर की सूरत बदलने में लगे हैैं। उनके आने से कार्यालय में पान-पुडिय़ा खाने वालों की शामत आ गई है। अवैध कब्जे वाली सरकारी जमीन खाली होने लगी है। शहर तेजी से स्मार्ट होने लगा है, लेकिन उनकी राह में शहर की सियासत रोड़ा अटका रही है। कोई उनकी शिकायत लेकर सरकार के पास पहुंच रहा है तो कोई उनको सभ्यता व संस्कृति का पाठ पढ़ा रहा है। युवा अधिकारी भी जिद्दी हैं। सियासी रोड़ा के बाद भी अपने लक्ष्य से पीछे हटने को तैयार नहीं हैैं। सरकार ने उनको नहीं बदला तो वे शहर की सूरत बदल देंगे। 

धीरे से लगा जोर का झटका

युवा नेता को धीरे से जोर का झटका लगा है। वह ढाई साल से सफाई महकमे के मुखिया की कुर्सी पर बैठने का सपना संजोए हुए हैं, लेकिन कुर्सी पास आकर फिसल जा रही है। दो साल पहले उन्होंने तन-मन-धन से कुर्सी खाली कराई ताकि बैठ सकें। जब बैठने की बारी आई तो अपने ने उनके साथ दगा किया और कुर्सी पास आते-आते फिसल गई। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और मौके का इंतजार करते रहे। दो माह पूर्व मौका मिला तो फिर कुर्सी को खाली करा लिया। इस बार उनको कुर्सी मिलनी तय थी, लेकिन फिर किस्मत दगा दे गई। जैसे ही उनको पता चला कि कुर्सी पर बैठने वाले का अब चुनाव नहीं होगा। उनको जोर का झटका धीरे से लगा है। कुर्सी पर बैठने के लिए उन्होंने जो तन-मन-धन लगाया था सब बेकार हो गया।

आवारा पशु और साहब की सेल्फी

साहब युवा हैं। पढ़-लिखकर सरकारी सेवा में आए हैं। हाल ही में उनको नई जिम्मेदारी मिली है। जिले के सबसे बड़े हाकिम ने उनको सफाई महकमे की सेवा में भेजा है। सफाई महकमे के हाकिम ने उनको शहर की सफाई व्यवस्था दुरुस्त कराने के काम में लगा दिया है। जिम्मेदारी मिलते ही साहब आधी रात में शहर का भ्रमण करने निकले। इस दौरान उन्हें जगह-जगह कूड़े-कचरे से खेलते और सड़कों पर घूमते आवारा पशु नजर आए। साहब ने कूड़े-कचरे के साथ आवारा पशुओं से निपटने की ठानी। इसलिए सबूत बनाने के लिए आवारा पशुओं के पास जाकर सेल्फी लेने लगे। अलग-अलग स्थानों पर दर्जनभर से अधिक सेल्फी ली और महकमे के बड़े हाकिम के पास भेज दी। बड़े हाकिम ने उनकी सेल्फी पर संज्ञान लिया। आवारा पशुओं से निपटने का जिम्मा दे दिया। युवा साहब टीम बनाकर अब आवारा पशुओं के पीछे पड़ गए हैैं। उनसे निपटने के बाद ही दम लेंगे।

फेल हो गए छात्र नेता

छात्र नेता की न दबंगई काम आई और न ही जान-पहचान। उपाधि की परीक्षा में फेल हो गए। उनको अब अपनों को जवाब देते नहीं बन रहा। छात्र नेता ज्ञान केंद्र की राजनीति में लंबे समय से हंै। ज्ञान केंद्र की सभी बड़ी कुर्सी से उनकी पहचान है। इसी पहचान के बल पर छात्र-छात्राओं का काम कराकर राजनीति में अपनी पहचान को बढ़ा रहे थे। सरकारी पार्टी से होने से उनकी दबंगई अलग से थी। इसलिए उनकी ज्ञान केंद्र में बड़ी पूछ थी। छात्र नेता अपने नाम के आगे उपाधि लगाना चाहते थे। इसलिए उपाधि वाली परीक्षा में बैठ गए। पढ़ाई नहीं की, सोचा जान-पहचान है तो पढऩे की क्या जरूरत? फार्म भरने के बार परीक्षा दी। पूरी उम्मीद थी कि बिना पढ़े पास कर जाएंगे, लेकिन जान-पहचान काम नहीं आई। नाम के आगे उपाधि लगाने का उनका सपना ही टूट गया।  

Edited By: Ajit Kumar