पूर्वी चंपारण [संजय कुमार उपाध्याय]। यह चीख खामोश है। लेकिन, इसमें जो दर्द है, वह चेहरे पर साफ है, दिमाग में भी। आदमी तो आदमी, बेजुबान भी आंखों से सबकुछ बोल रहे हैं। वहीं अपनों को खोने और ऊपर से अपनी जमीन में दफन नहीं करने का जो दर्द है, वह ऐसा है कि आदमी टूट जाता है। कुछ बोल नहीं पाता और चिता उसी सड़क पर सजा लेता है, जहां पेट की आग बुझाने को चूल्हा जल रहा है।

बाढ़ की त्रासदी इस कदर लोगों को रुला रही है कि लोगों के चेहरों पर प्रकृति की मार साफ दिखाई देती है। संपत्ति खोने का दर्द, पेट की आग और अपनों के खोने का गम पूर्वी चंपारण के बाढ़ ने प्रभावित इलाके के लोगों को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां से वापसी करने में सालों लगेंगे। लोगों में सिस्टम की लाचारी को लेकर आक्रोश है। 
हर रोज किसी न किसी की चिता जल रही है, लेकिन श्मसान में नहीं, सड़क पर। वह भी उस सड़क पर जहां आदमी अपने बाल-बच्चों और मवेशियों के साथ शरणागत है। आखें देख रहीं थीं, दिल समझ रहा था। लेकिन, दिमाग यह सोचने को मजबूर कि तबाही ऐसी होती है।

मोतिहारी से निकले तो यहां से लखौरा के रास्ते, छौड़ादानो के दुहो-सुहो, रक्सौल समेत कई इलाकों को जोडऩेवाली मुख्य सड़क पर आदमी, चूल्हा और श्मशान एक साथ होते नजर आए। अपने बेजुबान पशु और बच्चों संग मोतिहारी लखौरा पथ में सैकड़ों की संख्या में आदमी रह रहे हैं। सवाल भूख से खुद को और अपनों को बचाने का है, सो हर आदमी जान की बाजी लगा रहा है।
इसी सड़क पर जिंदगी के मुश्किल वक्त गुजार रहे झिटकहिया के प्रभु सहनी मिले। उन्हें लगा कि यह आदमी राहत दिला देगा, बोले-'जन्माष्टमी की रात से पानी का कहर बरप रहा है। अचानक से पानी प्रवेश कर गया, अभी कुछ संभाल पाते कि घरों में पानी कमर से ऊपर हो गया। भाग आए सड़क पर। लेकिन, राहत नहीं मिली।'

सरयू राय की बात, 'पानी अचानक आ गइल। धान गायब हो गइल। घर में जे भी रहे भींग के गल गइल। इ बार त उख भी ना होई। न जाने आगे का होई।'

बहू की लाश को ससुर ने सड़क पर दी अंतिम विदाई
बरनवा घाट पुल के आगे जो दिखा वह इनसान की उस मजबूरी को बयां कर रहा था कि मौत के बाद दो गज अपनी जमीन भी नसीब न हुई। लखौरा बाजार से थोड़ा पहले सड़क की बाईं तरफ चिता सजाई जा रही थी। जो दिखा वह चौंका देनेवाला था। कुछ चिताएं जल चुकीं थीं और कुछ सज रहीं थीं। एक अधेड़ आदमी लगातार रो रहा था।

ग्रामीणों  ने बताया, रविवार को हमारे गांव के गुड्डू सहनी की पत्नी बबिता देवी उर्फ मुअनो की मौत हो गई। सिर में दर्द से परेशान रहती थी। इलाज चल रहा था। अचानक रविवार की रात दर्द हुआ। आवागमन का साधन नहीं मिला औरं वह मर गई। बेटा काठमांडू में हैं। बहू की लाश जलाना और सामने हुई मौत ने इस इंसान को ही नहीं बल्कि पूरे गांव को तोड़ दिया है। हमारे यहां श्मशान में कमर भर पानी है। हमारे लिए तो यह सड़क ही अब सबकुछ है।
हर तरफ मौत का पहरा
लखौरा से आगे चिचोरहिया और बहुअरी के रास्ते में बाढ़ का पानी मौत बन सड़क पर है। सड़क पर बह रहे ढाई फीट पानी के बीच से गुजर रहे चिचोरहिया के नितेश सहनी, दशई मुखिया, मुकेश सहनी और मनोहर सहनी की बातें - 'साहेब लगातार दस दिनों से बाढ़ की तबाही झेल रहे हैं। घर का राशन भींग गया है। बच्चे भूख से तड़प रहे हैं।'

Posted By: Amit Alok

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