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पद्मश्री डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी का निधन, शिक्षा जगत में शोक की लहर

Published: Tue, 12 May 2026 08:07 AM (IST)

मुजफ्फरपुर के पद्मश्री से सम्मानित पूर्व कुलपति डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी का निधन हो गया है। शिक्षा जगत में शोक की लहर है।

पद्मश्री डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी (फाइल फोटो )

पद्मश्री डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी (फाइल फोटो )

HighLights

  1. पद्मश्री डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी का निधन

  2. मुजफ्फरपुर के पूर्व कुलपति थे

  3. शिक्षा जगत में शोक की लहर

अमरेन्द्र तिवारी, मुजफ्फरपुर। पद्मविभूषित पूर्व कुलपति डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी नहीं रहे। इलाज के दौरान मेदांता अस्पताल में उन्होंने आज सुबह 5:30 बजे अंतिम सांस ली। उनके पुत्र डॉ रमन त्रिवेदी में बताया कि रविवार को उन्हें सांस संबंधी परेशानी होने के बाद मेदांता अस्पताल पटना में भर्ती कराए थे। 

तीन दिन इलाज के बाद अंतिम सांस ली। विज्ञान और इंजीनियरिंग श्रेणी में पद्मश्री पाने वाले बिहार के मुजफ्फरपुर निवासी कृषि विज्ञानी डॉ. गोपालजी त्रिवेदी देशभर में लीची उत्पादन के लिए मशहूर मुजफ्फरपुर के पुराने बागों को बचाने के लिए पुनर्जीवन कैनोपी मैनेजमेंट तकनीक पर काम किया।

मक्के की खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान 

इसके साथ ही जलजमाव वाले क्षेत्रों में मल्टी फार्मिंग व रबी मौसम में मक्के की खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इससे न केवल किसानों की आय दोगुनी हुई, बल्कि जलजमाव वाले इलाकों के बेहतर उपयोग का रास्ता भी खुला। 

मुजफ्फरपुर में करीब 12 हजार हेक्टेयर में लीची की खेती होती है। समय के साथ बहुत से बाग काफी पुराने हो गए। इससे उत्पादन कम हो गया। नए बाग लगाने के लिए कम जगह और उन्हें लगाने के कई वर्षों बाद फलन को देखने हुए कृषि विज्ञानी डॉ. गोपालजी त्रिवेदी ने 2003 में ही लीची के पुनर्जीवन कैनोपी मैनेजमेंट की शुरुआत की।

पुराने व अनुत्पादक पेड़ों के लिए बहुत फायदेमंद

यह तकनीक विशेष रूप से 40-50 साल से अधिक पुराने व अनुत्पादक पेड़ों के लिए बहुत फायदेमंद है। इसमें बहुत ऊंचे और घने पेड़ों को काट-छांट कर छोटा (1.5 मीटर की ऊंचाई तक) किया जाता है।

इससे स्वस्थ व फल देने वाली नई शाखाएं तेजी से निकलती हैं। कटाई के बाद पेड़ को गोबर की खाद के अलावा अन्य पोषक तत्व दिए जाते हैं। इससे पुराने बागों को हटाए बिना ही नए पेड़ की तरह उपज प्राप्त होने लगती है। प्रारंभिक चरण में वह अपने बाग के 10 पेड़ों पर इसका प्रयोग किया तो सवा क्विंटल तक फलन बढ़ गया। 

जलजमाव वाले क्षेत्र को मत्स्य आधारित खेती में बदल दिया

इसके अलावा जलजमाव वाले क्षेत्रों में मखाना, सिंघाड़ा की खेती में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का श्रेय डॉ. त्रिवेदी को जाता है। उनके प्रयास से 22 किसानों ने 86 एकड़ परती व जलजमाव वाले क्षेत्र को मत्स्य आधारित खेती में बदल दिया। इसमें मछली पालन, किनारों पर पौधारोपण और अन्य फसलों की खेती की जाती है।  

इसे ‘बाबा परियोजना’ (बिहार एक्वाकल्चर बेस्ड एग्रीकल्चर) के नाम से जाना जाता है। इससे भूजल स्तर में सुधार हुआ है। 30–35 लोगों को सीधा और लगभग 200 लोगों को परोक्ष रोजगार मिला।