मुजफ्फरपुर, जासं। जिले में कोरोना आपदा के बीच निजी अस्पतालों का विकृत चेहरा सामने आने लगा है। कोरोना मरीजों के इलाज के नामपर भारी लूट जारी है। सोमवार को डीएम प्रणव कुमार के आदेश पर गठित धावा दल ने नोबल अस्पताल में छापेमारी की तो लूट का सच सामने आ गया। डीआरडीए निदेशक चंदन चौहान, टाउन डीएसपी रामनरेश पासवान के नेतृत्व में टीम जैसे ही अस्पताल पहुंची वहां के कर्मचारी भागने लगे। उनकी इस गतिविधि ने पहले ही साबित कर दिया गया कि कोरोना मरीजों के इलाज के नामपर बस लूट का धंधा चल रहा था।

जांच में यह बात सामने आई कि साहेबगंज प्रखंड की सरस्वती देवी कोरोना संक्रमित होने के बाद नोबल अस्पताल में भर्ती हुई थी। अस्पताल प्रबंधन ने आइसीयू ट्रीटमेंट के लिए तीन दिनों में दो लाख रुपये का बिल बना दिया। महिला की मौत भी हो गई। दल ने पाया कि कोविड मरीजों का दोहन किया जा रहा है। इलाज के नाम पर अधिक राशि वसूल की जा रही है। प्रखंड की रजवाड़ा हरिपुर ग्राम कचहरी के सरपंच ईश्वर चंद्र दिवाकर की शिकायत के बाद दल ने अस्पताल में छापेमारी की थी। जांच के दौरान पाया गया कि अन्य कोविड संक्रमित भर्ती था। उससे भी आइसीयू और दवा के नाम पर बड़ी राशि चार्ज की गई। डीआरडीए निदेशक ने कहा कि अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई के साथ कोरोना के इलाज की स्वीकृति भी वापस लेने की अनुशंसा की जा रही है।

श्री अस्पताल की बेहतर दिखी व्यवस्था

धावा दल ने चर्च रोड स्थित श्री अस्पताल की भी जांच की। डीआरडीए निदेशक ने कहा कि उक्त अस्पताल में व्यवस्था बेहतर थी। चिकित्सक मौजूद थे। ऑक्सीजन की आपूर्ति भी बेहतर दिखी। पारा मेडिकल स्टाफ का भी रोस्टर निर्धारित पाया गया।

सवाल के घेरे में सीएस कार्यालय

कोरोना मरीजों के इलाज के लिए सिविल सर्जन कार्यालय से अनुमति दी जानी है। सरकार ने इसके लिए अनुमति देने से पहले अस्पताल की पुख्ता जांच करने का निर्देश दिया था, मगर जिस तरह से इलाज के नामपर लूट की बात सामने आ रही उससे सिविल सर्जन कार्यालय सवाल के घेरे में आ गया है। आखिर इन अस्पतालों को कोरोना मरीजों के इलाज की स्वीकृति कैसे दे दी गई जहां चिकित्सक तक नहीं हैं। कहीं यूनानी तो कहीं आयुर्वेद चिकित्सक मिल रहे। यहां तक कि कुछ बड़े नाम वाले अस्पतालों की हालत भी इस तरह की है।