वे दिन भी क्या दिन थे, बैलगाड़ी से मुजफ्फरपुर का मेला देखने आते थे लोग और छाता चौक पर गूंजती थी कव्वाली
Muzaffarpur Durga Puja Old Memories: मुजफ्फरपुर के दशहरा मेले का स्वरूप दो दशकों में पूरी तरह बदल गया है। कभी ...और पढ़ें

Old Culture vs Modern Puja Pandals: मेले की सांस्कृतिक मिठास अब वक्त की धूल में कहीं खो गई है। (AI Generated Image)
HighLights
दो दशक में मुजफ्फरपुर मेले का स्वरूप बदला।
शास्त्रीय संगीत, कव्वाली की जगह अब सेल्फी।
पारंपरिक मेल-मिलाप की जगह आधुनिक चकाचौंध।
जागरण संवाददाता, मुजफ्फरपुर। Classical Music Qawwali Muzaffarpur Fair: कभी कल्याणी चौक और धर्मशाला चौक पर बजने वाली शास्त्रीय संगीत की महफिलें, छाता चौक पर राष्ट्रीय स्तर के कव्वालों की जुगलबंदी और वीणा सिनेमा हॉल के पास नाटकों के मंचन पर मुग्ध होते लोग...।
यह दो दशक पहले के मुजफ्फरपुर के उस दशहरा मेले की तस्वीर है, जिसकी सांस्कृतिक मिठास अब वक्त की धूल में कहीं खो गई है।
तब मेले का मतलब सिर्फ घूमना नहीं, बल्कि कला, संगीत और मेल-मिलाप का जीवंत उत्सव हुआ करता था, जो अब भव्य पूजा पंडालों और बिजली की चकाचौंध के बीच सिमट कर रह गया है।
लालटेन की रोशनी में जनसैलाब
दो दशक पहले के दौर को याद करें तो शहर का नजारा बिल्कुल अलग था। वरिष्ठ नागरिकों के अनुसार, तब लोग गांवों से बैलगाड़ी, साइकिल या पैदल ही समूह में लंबी दूरी तय कर मेला देखने आते थे।
रास्तों और मेलों में रोशनी के लिए आधुनिक एलईडी झालरों की जगह लालटेन या गैस-बत्ती का इस्तेमाल होता था। हरिसभा चौक के पास लगने वाला मीना बाजार बंगाली समाज के परिवारों के मिलन का मुख्य केंद्र होता था, जहां लोग अपनों से मिलकर पुराने दिनों को साझा करते थे।
मिट्टी के खिलौने, बांस-बेंत के हस्तनिर्मित सामान और खाजा-जलेबी जैसी पारंपरिक मिठाइयां इस मेले की असली पहचान थीं।
अब संस्कृति की जगह रील्स और सेल्फी
समय के साथ मेले का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। पारंपरिक खेल, दंगल, कठपुतली का नाच और जादू के खेल अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुके हैं।
आज के मेलों में पारंपरिक कला की जगह बड़े और आधुनिक झूले, डिजिटल साउंड सिस्टम, प्लास्टिक के चाइनीज खिलौने और फास्ट फूड ने ले ली है।
आज मेले में जाना सिर्फ घूमना नहीं, बल्कि रील्स बनाना, तस्वीरें खींचना और सोशल मीडिया पर साझा करना भर रह गया है।
पुरानी यादों की कहानी
इस बदलाव पर चर्चा करते हुए बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. एसके पाल बताते हैं कि 2001 से पहले मेला केवल खरीदारी का साधन नहीं, बल्कि भाईचारा बढ़ाने और सगे-संबंधियों से मिलने का मुख्य अवसर होता था। अब लोग सिर्फ पंडाल देखने और सेल्फी लेने निकलते हैं।
वहीं, यूको बैंक से सेवानिवृत्त अनिल कुमार सिन्हा और वरिष्ठ नागरिक विमल किशोर उप्पल का मानना है कि आधुनिकता और तकनीक की दौड़ में मेलों की वह पारंपरिक आत्मीयता और शांति अब कहीं खो गई है।
पूर्व सीनेटर प्रो. अरुण कुमार सिंह ने भी इस बात पर दुख जताया कि अब आयोजनों में भव्यता तो बढ़ी है, लेकिन सांस्कृतिक माहौल कहीं न कहीं क्षरित हुआ है।
