दरभंगा, विभाष झा। कोरोना की दस्तक के बाद भय की लहर। भारतीय छात्रों में अधिक। मन में सवाल था कि क्या घर लौट सकेंगे? यद्यपि अपने देश की सरकार पर भरोसा था। मगर, हालात विपरीत थे। 15 दिनों तक हर रात डरावनी लगी। बात तो यहां तक फैली कि चीनी सैनिक कोरोना पीडि़तों की हत्या कर दे रहे, लेकिन यह अफवाह थी। चीन से दरभंगा लौटे संजीव कुमार ने ये बातें दैनिक जागरण से शुक्रवार को विशेष बातचीत में शेयर कीं। उनके घर पहुंचते ही स्वजनों की आंखों में खुशी के आंसू छलक उठे। उन्होंने भगवान के साथ-साथ मोदी सरकार को भी धन्यवाद दिया।  

आंखों में मंडराने लगा मौत का खौफ

 जिले के बेलादुल्लाह निवासी डॉ. शंकर चौधरी के पुत्र संजीव चीन के हुवेई प्रांत में स्थित हुवेई यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसीन के फाइनल ईयर के छात्र हैं। वे करीब साढ़े तीन साल से चीन में रहकर पढ़ाई कर रहे। बताया कि कोरोना वायरस फैलने और मौत की खबरें आने के बाद दिल में डर समा गया। यूनिवर्सिटी के कैंपस में रहने वाले तकरीबन 500 भारतीय छात्रों के लिए 17 जनवरी की रात तो डरावनी बनकर आई। कमरे से बाहर निकलने पर रोक लगा दी गई। फिर तो आंखों में मौत का खौफ मंडराने लगा।

 सड़कों की खामोशी और बाजार में पसरा सन्नाटा और डराता था। अपने-अपने कमरों में कैद मास्क लगाए जिंदगी की प्रार्थना करने लगे। छात्र एक-दूसरे से ठीक से बात नहीं कर पाते थे। खाने के लाले पडऩे लगे। खाने-पीने का जो सामान बचा था, उससे किसी तरह दिन कटा। इस बीच लगातार घरवालों और भारतीय दूतावास के संपर्क में थे। 

भारत सरकार का धन्‍यवाद

 डॉक्टर समय-समय पर जांच करने आते थे। करीब 15 दिनों की डरावनी रात के बाद उजाले की किरण दिखाई पड़ी। भारत सरकार और चीन में भारतीय दूतावास के सहयोग से एक फरवरी की रात हुआन प्रांत लाया गया। वहां से विमान से दो फरवरी को नई दिल्ली लाया गया। फ्लाइट में कुल 407 यात्री सवार हुए थे। इनमें 144 छात्र थे। यहां भी घर जाने को इजाजत नहीं मिली।

 सभी को आइटीबीपी छावनी ले जाया गया, जहां 15 दिनों तक गहन चिकित्सा व्यवस्था में रखा गया। सभी तरह की जांच के बाद घर जाने की अनुमति मिली। मोदी सरकार का धन्यवाद करते हुए संजीव कहते हैं कि हिंदू हो या मुसलमान, सभी को निकालने में मदद की। अभी भी वहां पाकिस्तान और अफ्रीका के कई छात्र फंसे हुए हैं। 

Posted By: Murari Kumar

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