मुजफ्फरपुर, जेएनएन। लंगट सिंह कॉलेज के ऐतिहासिक महत्व को संरक्षित करने की कवायद जारी है। ग्रीन ऑडिट कराया जाएगा। अब इसी कड़ी में सौ साल से लेकर सौ दिन तक के पौधे को बोटैनिकल नाम मिलेगा। 60 एकड़ में फैले परिसर में कितने नए और पुराने पौधे हैं, इसकी गणना की जाएगी। सभी पेड़ों की पहचान के लिए संख्या कोड व बोटैनिकल नाम लिखकर उसमें चिपकाया जाएगा। 

पेड़-पौधे के गुण-दोष जानेंगे छात्र 

महाविद्यालय परिसर स्थित पेड़-पौधे का क्या महत्व है। कौन पौधा मानव के लिए कितना महत्वपूर्ण तथा तथा किस पौधे को नष्ट किया जा सकता है। ऑक्सीजन के लिए कौन से पेड़ की क्या अहमियत है। पेड़-पौधे को बचाने के लिए क्या पहल होनी चाहिए। इस जानकारी से वनस्पति विज्ञान के साथ जनसंचार के छात्र भी अवगत होंगे।

ग्रीन एंड क्लीन कैंपस बनाना उद्देश्य 

वनस्पति विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.प्रेमशंकर सिंह अपनी टीम के प्रो. पीयूष कुमार वर्मा, प्रो.गौरव पांडेय, प्रो.रीमा श्रीवास्तव के साथ सर्वे का काम पूरा करेंगे। अभियान का उद्देश्य इको फ्रेंडली व ग्रीन एंड क्लीन कैंपस बनाना है। 

ब्राजील से मंगाई थी महोगनी 

एलएस कॉलेज के प्राचार्य डॉ.ओपी राय ने बताया कि परिसर में कई पौधे हैं जो एक सौ साल पहले वाले हैं। ब्राजील से बाबू लंगट सिंह ने सन 1908-09 में महोगनी के पौधे लाकर लगाए थे। एलएस कॉलेज परिसर में प्रवेश के साथ ही यह पुराने पेड़ अपनी खूबसूरती बिखरते हैं। परिसर में बरगद के पेड़ भी काफी पुराने हैं।

परिसर में मौजूद पेड़-पौधे 

नीम, पीपल, बरगद, महोगनी, यूकेलिप्टस, सागवान, सेमल, गुलमोहर, कचनार, अमलताश, कदम, बबूल, जामुन, आम, लीची, बेल, शमी, शीशम, पलास, आंवला, नींबू, अमरूद, विभिन्न प्रजाति के केले, नारियल, सोहजन सहित कई औषधीय पेड़-पौधे भी हैं। वहीं फूल की विभिन्न प्रजातियों में गेंदा, गुलाब, गुलदाउदी, कामनी, जूही, चंपा, मयूरपंख, करोटन, ओढ़उल, डालिया, कल्पतरू, कनैल आदि प्रमुख हैं। एसएनएस कॉलेज हाजीपुर जंतु विज्ञान विभागाध्यक्ष व पर्यावरणविद् डॉ. सत्येंद्र कुमार ने बताया कि परिसर में स्थित महोगनी में औषधीय गुण भी हैं। इसके पत्तों का उपयोग कैंसर, ब्लडप्रेशर, अस्थमा, सर्दी, मधुमेह सहित अन्य रोगों में होता है। यह दक्षिण अमेरिका और डोमिनिकन गणराज्य का राष्ट्रीय वृक्ष है।

 महोगनी की लकड़ी से चौकठ, फर्नीचर और लकड़ी के अन्य नाव निर्माण होता है। उन्होंने बताया कि कल्पतरु पेड़ आकार में विशालकाय होते हैं और इनकी उम्र हजारों साल होती है। अफ्रीका में इस पेड़ के कुछ तने इतने मोटे होते हैं कि इसमें आदमी घर बनाकर रह सकता है। यह 25 मीटर ऊंचा हो सकता है और साल में करीब नौ महीने बिना पत्तों के रहता है। रांची के डोरंडा कॉलेज के पास तीन कल्पतरु करीब ढाई सौ वर्ष पुराना है।

पत्थरचट्टा होता में औषधीय गुण 

पत्थरचट्टा के अवशेष भी कॉलेज के आकर्षण हैं। यह अवशेष 76 बैच के वनस्पति विज्ञान प्रतिष्ठा के छात्रों द्वारा लाया गया था। यह भी एक प्रकार का औषधीय गुण का पौधा होते हैं। ये किडऩी में पथरी की समस्या को खत्म करने में बेहद कारगर होता है। ये पौधा खाने में खट्टा, नमकीन और स्वादिष्ट होता है। इसका उपयोग व सेवन कई प्रकार से किया जा सकता है, जैसे आप चाहे तो इसकी सब्जी भी बना सकते हैं।

पत्थरचट्टा के दो पत्तों का तोड़कर उन्हें पानी से अच्छी तरह से साफ कर लें। फिर सुबह-सुबह खाली पेट गरम पानी के साथ इनका सेवन करें। ऐसा नियमित करने पर पथरी की समस्या से राहत मिलती है।

 इस बारे में एलएस कॉलेज के प्राचार्य डॉ. ओपी राय ने कहा कि यूजीसी की ओर से एलएस कॉलेज को ऐतिहासिक धरोहर का दर्जा मिला हुआ है। ग्रीन ऑडिट कराया जा रहा है। सभी पेड़-पौधे को बोटैनिकल नाम दिया जाएगा। पुरातत्व विभाग इसको संरक्षित करे यह पहल चल रही है। कॉलेज प्रशासन के साथ पूर्ववर्ती छात्र, व्यवसायी संगठनों के प्रतिनिधियों,  सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद व आम अवाम से अपील है कि वे धरोहर को बचाने में सहयोग करें। 

Posted By: Murari Kumar

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