मुजफ्फरपुर। बीस साल तक मुंबई में नौकरी। कभी इस तो कभी उस कंपनी में सेल्समैन। इसके बाद भी न तो परिवार का खर्च ठीक से चल पाता था और न ही अपने लिए समय मिल पाता था। मुरारी रूंगटा ने दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्टार्टअप इंडिया से प्रेरणा लेकर नौकरी छोड़ अपना काम शुरू किया तो तरक्की की राह खुलने लगी। आज खुद अच्छी-खासी आमदनी करने के साथ तकरीबन सात दर्जन महिलाओं को रोजगार दे रहे हैं।

निर्मली निवासी स्नातक पास मुरारी रूंगटा 20 साल पहले नौकरी की तलाश में मुंबई गए। वहां कई कंपनियों में सेल्समैन का काम किया। उस कमाई से किसी तरह घर चल पाता था। परिवार भी साथ नहीं रख पाते थे। पिता गोविंद राम रूंगटा की चाहत थी कि बेटा साथ रहे। लेकिन, नौकरी के चलते यह संभव नहीं हो पाता था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण, युवा को रोजगार मांगने वाला नहीं, रोजगार देने वाला बनाना चाहिए से इतने प्रेरित हुए कि 2016 में नौकरी छोड़ दी।

आर्डर लेने के लिए दुकानदारों का चक्कर : काफी विचार के बाद रेडीमेड कपड़े बनाने का निर्णय लिया। मिठनपुरा के नकुलवा चौक के समीप छोटी सी जगह लेकर काम शुरू किया। उन्हें पेटीकोट बनाकर बेचने का काम सबसे अच्छा व सुविधाजनक लगा। इसका आर्डर लेने के लिए वे साड़ी व कपड़े के दुकानदारों के पास पहुंचने लगे। कपड़े के एक कारोबारी के यहां वे करीब 100 बार गए। तैयार माल, कपड़े और रंग की पूरी गारंटी देकर किसी तरह मोटिवेट किया। धीरे-धीरे कई दुकानदार खरीदार मिल गए। काम बढ़ाने के लिए रुपयों की जरूरत पड़ी तो एक पार्टनर ललित कुमार भी मिल गए। आज वे मुजफ्फरपुर के अलावा दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, रक्सौल, बेतिया और बगहा सहित अन्य जगहों पर पेटीकोट की सप्लाई करते हैं।

एक महिला बनाती 15 कपड़े :

मुरारी कपड़े की कटिंग कर धागे के साथ मैच लगाकर सिलाई के लिए महिलाओं को दे देते हैं। एक महिला प्रतिदिन 15 कपड़ों की सिलाई कर देती है। इसके एवज में घर बैठे उसे डेढ़ से दो सौ रुपये मिल जाते हैं। अभी मिठनपुरा, रामबाग, चंदवारा, मिस्कॉट, अखाड़ाघाट, मोतीझील और कलमबाग रोड सहित शहर के विभिन्न हिस्सों की 80 महिलाएं उनके लिए काम कर रही हैं। उनकी दुकान से महिलाएं कपड़ा ले जाकर घर से सिलाई कर लाती हैं। उनका नाम, कपड़े का रंग आदि रजिस्टर में दर्ज किया जाता है। रामबाग की अंजुम बेगम का कहना है कि जबसे सिलाई के काम में लगी हूं, घर की आर्थिक समस्या दूर हो गई है।

मुरारी कहते हैं, शुरुआत में काफी समस्या आई। किसी दुकानदार को समझाना आसान नहीं था। लेकिन, गुणवत्ता के चलते धीरे-धीरे बिजनेस चल पड़ा। महीने में खर्चा काट कर 25 से 30 हजार कमा लेते हैं। वह कहते हैं, नए साल में उनका लक्ष्य 150 महिलाओं को रोजगार देना है।

Posted By: Jagran