पूर्वी चंपारण, [सुशील वर्मा]। जिन हाथों में कभी बंदूक व अन्य हथियार होते थे, अब चरखा है। वे समाज की मुख्यधारा से जुडऩे के लिए सूत कातना सीख रहे हैं। यह सब हो रहा केंद्रीय कारा, मोतिहारी में। यहां कारा प्रशासन ने कैदियों को सुधारने और रोजगार से जोडऩे के लिए यह पहल की है। अभी 30 कैदियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा। इसके बाद अन्य को दिया जाएगा।

बापू की कर्मभूमि में चरखा से हत्या व अन्य गंभीर अपराध की सजा काट रहे कैदियों को सत्य और अहिंसा का संदेश दिया जा रहा है। इसके लिए महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर केंद्रीय कारा में सूत कातने के लिए चार आधुनिक चरखे लगाए गए हैं। कैदियों को इसे चलाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा। इसके लिए 10-10 कैदियों के तीन बैच बनाए गए हैं। प्रशिक्षक के रूप में गोपालगंज के नागेंद्र कुमार तैनात हैं। प्रशिक्षण लेने वालों में सुरेश सिंह, इम्तियाज अली, ललन सहनी, रामाकांत चौधरी, रामानंद साह, निर्मल चौरसिया, हरेराम यादव और बैद्यनाथ प्रसाद सहित अन्य कैदी हैं।

कपड़ा बनाने की मशीन का भेजा गया प्रस्ताव

सूत काटने की ट्रेनिंग डेढ़ महीने की है। काते गए सूत से कपड़े का निर्माण होगा। जनवरी में इसकी शुरुआत करने की योजना है। इसके लिए बीते सितंबर में कपड़ा बनाने की मशीन लगाने का प्रस्ताव भेजा गया। यहां बना कपड़ा कारा के अलावा बाजार में भी भेजा जाएगा। इससे जेल कमाई भी कर सकेगा।

कैदियों को दे रहे सत्य व अहिंसा का संस्कार

कारा उपाधीक्षक सूर्यनाथ सिंह का कहना है कि एक चरखे पर 15 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। दो अक्टूबर को इसका शुभारंभ हुआ। चरखा चलाने व सूत काटने के माध्यम से कैदियों को सत्य व अङ्क्षहसा का संस्कार दिया जा रहा है। कोशिश हो रही है कि जब ये कैदी जेल से बाहर निकलें तो हुनर के खुद के बल पर रोजगार कर सकें। अपराध से दूर रहें। साथ ही समाज में स्वदेशी व स्वावलंबन की अलख जगाएं। जो कैदी प्रशिक्षण ले रहे, उनके व्यवहार परिवर्तन पर भी नजर रखी जा रही। उनकी लगातार मॉनीटङ्क्षरग की जा रही है।  

Posted By: Ajit Kumar

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