मुजफ्फरपुर। खरीफ फसल में रबी की तुलना में खरपतवारों के प्रकोप से अधिक क्षति होती है। सामान्यत: खरपतवार फसलों को प्राप्त होने वाली 47 प्रतिशत नाइट्रोजन, 42 प्रतिशत फॉस्फोरस, 50 प्रतिशत पोटाश, 39 प्रतिशत कैल्शियम और 24 प्रतिशत मैग्नीशियम तक का उपयोग कर लेते हैं। इसके साथ-साथ खरपतवार फसलों के लिए नुकसानदायक रोगों और कीटों को भी आश्रय देकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इनके अलावा कुछ जहरीले खरपतवार जैसे गाजर घास (पार्थनियम), धतूरा, गोखरू, कांटेदार चौलाई आदि न केवल फार्म उत्पाद की गुणवत्ता को घटाते हैं बल्कि मनुष्य और पशुओं के स्वास्थ्य के प्रति खतरा उत्पन्न करते हैं। खरपतवारों द्वारा फसल में होने वाली क्षति की सीमा, फसल, मौसम तथा खरपतवारों के प्रकार तथा उनकी संख्या पर निर्भर करती है अत: सभी फसलों में खरपतवारों की उपस्थिति के कारण समान क्षति नहीं होती है। इसकी जानकारी देते हुए कृषि परामर्शी डॉ. मुकेश कुमार ने बताया कि खरपतवार व कीटों से फसल को बचाने के लिए किसानों को तय मात्रा में दवाओं का उपयोग करना चाहिए, ताकि फसल हो होने वाले नुकसान से बचाया जा सके। कैसे करें खरपतवारों का नियंत्रण

किसान खरपतवारों को अपनी फसलों में विभिन्न विधियों जैसे कर्षण, यांत्रिकी, रसायनों तथा बायोलोजिकल विधि आदि का प्रयोग करके नियंत्रण कर सकते हैं। लेकिन पारंपरिक विधियों के द्वारा खरपतवारों का नियंत्रण करने पर लागत तथा समय अधिक लगता है। इसलिए रसायनों द्वारा खरपतवार जल्दी व प्रभावशाली ढंग से नियंत्रित किए जाते हैं। यह विधि आर्थिक दृष्टि से लाभकारी भी है। लेकिन शोध कार्यों द्वारा प्रमाणित कुछ निम्नलिखित सस्य क्रियाएं भी खरपतवारों के प्रकोप को कम करने में लाभदायक पाई गई हैं। खरीफ मौसम की मुख्य फसलों में प्रयोग किए जाने वाली शाकनीशी-रसायनों की विस्तृत जानकारी लेकर फसल के अनुसार किसी एक रसायन का चुनाव करके खरपतवारों की आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। फसलों में लगे इन रोगों का है बेहतर उपचार

तनाछेदक कीट के आक्रमण होने पर कार्बाफ्यूरान 2जी दानेदार 25 किलोग्राम या फोरेट 10 जी दानेदार 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर खेतों में दिया जा सकता है। पिल्लू को नियंत्रित करने के लिए कार्टाप हाईड्रोक्लोराइड 4 जी दानेदार 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर खेतों में दिया जा सकता है। वहीं पत्तियों या अन्य हरे भाग को किनारे से काटने से शुरू होता जो ज्यादातर रात में नुकसान करती है। इसे नियंत्रित करने के लिए शाम के समय खेतों के आसपास पुआल जला कर उसे धुंए से फसल को रोग से बचाया जा सकता है या ¨सचाई के पानी में क्लोरपायरीफॉस 20 प्रतिशत ईसी मिलाया कर दिया जा सकता है। शीथ रॉट बीमारी बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में फसलों में ज्यादा होने की संभावना होती है। इसके नियंत्रण के लिए मैन्कोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना लाभकारी होगा। शीथ ब्लाईट रोग से बचाव को खेत में जल निकास का उत्तम प्रबंध करें। साथ ही यूरिया का टॉप ट्रं¨सग सुधार होने तक बंद रखें।

Posted By: Jagran