मोतिहारी [धीरज श्रीवास्तव शानू]। केबीसी-5 के विजेता सुशील कुमार का गौरैया बचाव अभियान अब रंग दिखाने लगा है। उन्होंने अबतक कम से कम दो हजार घरों में गौरैया का घोंंसला लगाया है। इनमें से 500 घोसलों में गौरैया की आमद हो चुकी है।  यह सारा काम वे खुद अपने संसाधन के बदौलत कर रहे हैं। इस कार्य मे उन्हें दूसरे लोगो का भी अब साथ मिलने लगा है। पहले वे लोगो से अपने घरों में घोषला लगवाने की अपील करते थे। लेकिन अभियान से प्रभावित होकर गृह जिला पूर्वी चंपारण के साथ ही अब दूसरे जिलों से भी लोग उन्हें घोषला लगाने के लिये खुद आमंत्रित करते हैं।

  • photo- मोतिहारी। घोंसला व अनाज की बाली देते सुशील कुमार

 सुशील बताते हैं कि उनके इस अभियान के तीन चरण हैं। पहले चरण में एक छोटा सा घोषला लगाया जाता है। इसमें एक जोड़ी गौरैया रह सकता है। अगर इस घोषला का गृहस्वामी द्वारा सही तरीके से देखभाल किया जाता है तो इसमें गौरैया आ जाता है तो दूसरे चरण में वहां नौ खंड वाला घोषला लगाया जाता है। अगर नौ खंड के घोषला में 5 खंड में गौरैया आ जाते हैं तो तीसरे चरण में वहां 15 खंड का घोषला लगाया जाता है। साथ ही वे संबंधित गृहस्वामी को सम्मानित भी करते हैं। पिछले कुछ सालों में सुशील पर्यावरण के प्रति लगातार सक्रिय रहकर विभिन्न तरह के अभियानों को चला रहा हैं।

 उनका पौधरोपण अभियान भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना है। सुशील बताते हैं प्रकृति ने हमें कई उपहारों से नवाजा है। जब प्रकृति ने हमें इतना कुछ दिया है तो हमारा भी फर्ज बनता है कि हम भी प्रकृति के संतुलन में अपना यथासम्भव योगदान दें। हम जो भी कमाते हैं उसका कुछ फीसद प्रकृति व समाजसेवा में जरूर खर्च करना चाहिए।

  • Photo- मोतिहारी। गौरैया बचाव अभियान के प्रथम चरण में छोटा घोंसला प्रदान करते सुशील कुमार।

पूरी दुनिया के लिए गौरैया का संरक्षण बड़ी चुनौती

प्रकृति की सभी रचनाएं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष एक-दूसरे पर निर्भर हैं और उनमें हमारे साथ-साथ नन्ही गौरैया भी शामिल हैं। घर हमारे बड़े-बड़े हो गए हैं, पर दिल इतने छोटे कि उनमें नन्हीं-सी गौरैया भी नहीं आ पा रही। कभी घर आंगन में कलरव करने वाली चिड़िया गौरैया आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। यही कारण है कि आज पूरी दुनिया मे गौरैया संरक्षण-चिंता के विषय वाली प्रजाति बन चुकी है। भारत में भी पक्षी वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले कुछ सालों में गौरैया की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई है।

 लगातार घटती इसकी संख्या को अगर हमने गंभीरता से नहीं लिया, तो वह दिन दूर नहीं, जब गौरैया हमेशा के लिए हमसे दूर चली जाएगी। गौरैया संरक्षण अभियान चला रहे केबीसी सीजन 5 के विजेता सुशील कुमार बताते हैं कि प्रकृति ने हमे कई उपहार दिए हैं। बेतहाशा हो रहे शहरीकरण व आधुनिकता की चकाचौंध में हम प्रकृति प्रदत्त उपहारों की लगातार उपेक्षा करते जा रहे हैं। यह विनाश को आमंत्रित करने के समान है। जरूरी है कि प्रकृतिक प्रदत उपहारों की कीमत पर आधुनिकीकरण के इस अंधे दौड़ को अविलंब रोका जाए। अब रुकने व आत्ममंथन करने की जरूरत है। 

  • Photo- मोतिहारी। शहर के हनुमानगढ़ी में प्रमोद आर्य के घर पर लगे घोंसला में कलरव करती गौरैया।

विलुप्ति के कगार पर है गौरैया

सुशील कहते हैं कि भारत के अधिकांश बड़े शहरों में गौरैया की स्थिति बहुत चिंताजनक है। यहां वे दिखाई देना मानो बंद-सी हो गई हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के एक सर्वेक्षण में भी पाया गया है कि इनकी संख्या आंध्र प्रदेश में 80 फीसदी तक कम हुई है और केरल, गुजरात व राजस्थान जैसे राज्यों में इसमें 20 फीसदी तक की कमी देखी गई है।

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप