मुजफ्फरपुर [प्रेम शंकर मिश्रा]। शाही लीची की तरह सबको चाहिए बिहार के मुजफ्फरपुर की शहद। हल्के सुनहरे रंग व विशेष खुशबू वाली शहद की खपत अमेरिका और जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों में बढ़ गई है। जिसने भी एक बार शहद का स्वाद चखा, दीवाना हो गया। शहद के उत्पादन से जिले में तकरीबन 50 हजार लोगों को रोजगार मिल रहा है। कारोबार बढ़ा तो बड़ी कंपनियों ने रुचि दिखाई और देखते ही देखते 300 करोड़ रुपये का व्यवसाय हो गया।

20 दिनों में ही लीची से दो बार शहद का उत्पादन

जिले में करीब 50 हजार मधुमक्खी पालक शहद उत्पादन से जुड़े हैं। लीची से शहद निकालने का समय बमुश्किल 15 से 20 दिन का होता है। इतने ही दिनों में दो बार शहद निकल जाता है। उत्पादन चार से पांच हजार टन होता है। मुख्य रूप से मार्च माह में ही लीची से शहद का उत्पादन मधुमक्खी पालक करते हैं। इसके उपरांत सरसों, यूकेलिप्टस, बाजरा और तिल आदि से शहद निकालने उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में चले जाते हैं। इस काम में जुटे मोहन कुमार, शंभू प्रसाद व राजेश कुमार गुप्ता कहते हैं कि दूसरे राज्यों में निर्धारित समय के लिए खेत मालिकों से जमीन किराए पर ली जाती है। यहां मधुमक्खी पालक अपने बक्से के साथ पहुंचते हैं।

10 खानों के बक्से में छत्ता बनातीं हैं मधुमक्खियां

आम की लकड़ी का 10 खाने का बक्सा तैयार किया जाता है। एक रानी व हजारों कामगार मधुमक्खियां इसमें रखी जाती हैं। जिस पौधे या पेड़ से शहद निकालना होता है, बक्सा उसके आसपास रखा जाता है। इन 10 खानों में ही मधुमक्खियां छत्ता बनाती हैं। रानी मधुमक्खी इनमें से कई छत्तों में अंडे देती है। कामगार मधुमक्खियां दूसरे छत्ते में शहद जमा करती हैं। फूलों में पराग के हिसाब से 10 या 15 दिनों में शहद छत्ते में भर जाता है। इसे निकाल लिया जाता है। तब, अंडा वाले छत्ते से कामगार मधुमक्खियां निकल आतीं हैं और फिर शहद निर्माण में जुट जातीं हैं। एक बक्से में 40 से 50 हजार कामगार मधुमक्खियां होती हैं।

300 करोड़ तक पहुंचा व्यापार

यहां उत्पादित शहद में से 90 फीसद बाहर चला जाता है। औसतन 40 हजार टन शहद का उत्पादन मधुमक्खी पालक सालाना करते हैं। इनकी मेहनत का ही असर है कि बिहार आज शहद उत्पादन में अग्रणी है। कारोबार तीन सौ करोड़ तक पहुंच गया है। आधा दर्जन कंपनियां यहां से शहद खरीदकर देश-विदेश के बाजार में भेजती हैं।

प्राकृतिक खुशबू व मिठास बनाती है खास

शहद उत्पादन व कारोबार से जुड़े दिलीप शाही कहते हैं, पश्चिमी देशों में चीनी का इस्तेमाल कम होता है। वे लीची के शहद का अधिक सेवन करते हैं। यह जल्द जमता नहीं और वसा की मात्रा भी नहीं होती। वजन घटाने में भी कारगर है। इसकी कीमत अन्य शहद से अधिक होती है।

मधुमक्‍खी पालकों को प्रोत्‍साहन देती सरकार

बिहार के कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार बताते हैं कि राज्य सरकार के कृषि रोडमैप में मधुमक्खी पालन को शामिल किया गया है। मधुमक्खी पालकों को अनुदान के साथ प्रोत्साहन व प्रशिक्षण की योजना बनी है। सरकार ने इसके लिए सौ करोड़ का प्रावधान किया है। इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाओं को देखते हुए जल्द ही सेमिनार का आयोजन किया जाएगा। सरकार चाहती है कि खेती के साथ किसान मधुमक्खी पालन भी करें।

शहद उत्पादन : एक नजर

Posted By: Amit Alok

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