हिंदी के विस्तार से समृद्ध हो रही भारतीय संस्कृति, नई पीढ़ी को जोड़ने पर जोर
दैनिक जागरण द्वारा मुजफ्फरपुर में आयोजित विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने हिंदी को भारतीय संस्कृति का सशक्त संवाहक बताया। उन्होंने ...और पढ़ें

दैनिक जागरण कार्यालय में भारतीय संस्कृति और हिंदी पर विचार गोष्ठी का आयोजन।
HighLights
हिंदी भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत का सशक्त संवाहक है।
भाषा संस्कृति को जीवित रखने और पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने का माध्यम।
नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने के लिए नए शब्द रचना जरूरी।
जागरण संवाददाता, मुजफ्फरपुर । दैनिक जागरण की ओर से बुधवार को कार्यालय में भारतीय संस्कृति और हिंदी विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें वक्ताओं ने हिंदी को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संवाहक बताया। कहा कि विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और जीवंत संस्कृतियों में एक भारतीय संस्कृति की आत्मा वसुधैव कुटुंबकम् में बसती है।
संस्कृति को जीवित रखने, पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम उसकी भाषा होती है। भारतीय संस्कृति के संवाहक और संरक्षक के रूप में यह गौरव हिंदी को प्राप्त है। हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि भारतीय सभ्यता, लोकाचार, संस्कारों और चेतना की संवाहक है।
वक्ताओं ने बदलते तकनीकी और चुनौतीपूर्ण युग में सांस्कृतिक स्वरूप को बचाए रखने के लिए कई चुनौतियों की तरफ भी ध्यान आकृष्ट कराया।
कहा कि हमारी सांस्कृतिक अस्मिता सुरक्षित रहे और आज की युवा पीढ़ी हिंदी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का ध्वजवाहक बने इसके लिए जरूरी है कि नए-नए शब्द रचे जाएं।
बताते चलें कि 10 अक्टूबर को दैनिक जागरण के यशस्वी प्रधान संपादक रहे श्रद्धेय नरेंद्र मोहन गुप्त की जयंती पर उनकी स्मृति में जागरण साहित्य सृजन सम्मान प्रदान किया जाएगा।
विचार संगोष्ठी में दैनिक जागरण के समाचार संपादक बृजेश कुमार दुबे ने विषय प्रवेश कराया। वहीं साहित्यकार डा.संजय पंकज ने संवाद का संयोजन और संचालन किया। धन्यवाद ज्ञापन दैनिक जागरण के जीएम एसएन पाठक ने किया।

हिंदी केवल संप्रेषण की भाषा नहीं बल्कि संस्कृति की संवाहक है। अंग्रेजों ने हिंदी पर क्षेत्रीय भाषाओं को तरजीह देकर संस्कृति को बिगाड़ने का प्रयास किया, लेकिन यह समय के साथ मजबूत होती चली गई। हिंदी भाषा की ताकत अद्वितीय है।
पूनम सिन्हा, साहित्यकार।

अमीर खुसरो को हिंदी का पहला कवि माना जाता है। भारत की जमीन बहु सांस्कृतिक रही है। जो हमसे कुछ छीनने आए वे भी कुछ न कुछ देकर गए और इसी संस्कृति का हिस्सा बने। जब भाषा से जुड़ते हैं तो सीधे -सीधे संस्कृति को आत्मसात करते हैं।
डा.चितरंजन कुमार, प्राध्यापक हिंदी, एलएनटी कालेज।

संस्कृति का विस्तार सही अर्थों में भाषा ही करती है। भाषा के बिना संस्कृति कुछ भी नहीं है। संस्कृति के बिना भाषा प्राणहीन है। भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए हिंदी के मूल स्वरूप को जीवित रखना होगा।
डा. पंकज कर्ण, साहित्यकार।

बदलते दौर में अपनी मातृभाषा के साथ-साथ एक और अन्य भारतीय भाषा सीखने की जरूरत है। गुलाम भारत के मुकाबले स्वतंत्रत भारत में हिंदी को कमजोर करने का प्रयास किया गया। युवा पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने के लिए इसका दायरा बढ़ान होगा।
प्रो. राजकुमार, साहित्यकार।

हिंदी और भारतीय संस्कृति सहचर है। वर्तमान में हिंदी का विस्तार पूरे विश्व में तेजी से हो रहा है। विदेशों में भी हिंदी पढ़ी-पढ़ाई जा रही है। फिल्म और हिंदी फिल्मों के गीत विदेशों में भी लोगों की जुबान पर चढ़ रहे हैं। यह हमारी भारतीय संस्कृति का ही विस्तार है।
प्रवीण कुमार मिश्र, साहित्यकार।

संस्कृति संस्कार शोधन की बात करता है। हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम की बात करती है। सारी लोकभाषाओं को अपने आंचल में समेटकर हिंदी लगातार आगे बढ़ रही है। हिंदी को साहित्य, दर्शन और सनातन की भाषा माना जाता है।
- डा.आरती कुमारी, साहित्यकार।

कवियों के भाषा आंदोलन ने संस्कृति के विस्तार की आधारशिला रखी। इसमें हिंदी भाषा की रचनाओं और कवियों ने अहम योगदान दिया। भाषा संस्कृति का संरक्षण और नेतृत्व करती है। भक्तिकालीन कवियों ने अपनी रचनाओं में संस्कृति की शक्ति को रचा है।
डा.शिवेंद्र मौर्य, सहायक प्राध्यापक।

साहित्य को संस्कृति का संरक्षक माना गया है। कवि या लेखक संस्कृति की रक्षा करने के लिए रचना करता है। अपनी रचनाओं के माध्यम से रचनाकार आम लोगों को अपनी संस्कृति की रक्षा करने के लिए तैयार करता है। कई विद्वानों ने हिंदीभाषी नहीं होते हुए भी हिंदी को अपनी रचना का माध्यम बनाया। यह हिंदी की व्यापकता को दर्शाता है।
डा. राकेश रंजन, सहायक प्राध्यापक।

डिजिटल और एआई के इस दौर में युवा पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने के लिए यह जरूरी है कि नए - नए शब्दों की रचना की जाए। बदलती संस्कृति को आत्मसात कर हिंदी की व्यापकता को विस्तार दिया जा सकता है। विज्ञान, इंजीनियरिंग, मेडिकल और तकनीकी शिक्षा की भाषा हिंदी को बनाना होगा। इसे रोजगार से जोड़ना होगा।
डा.एसएनपी सिंह, सेवानिवृत्त प्राध्यापक।

संस्कृति का अर्थ ही होता है बहुलता और विविधता। हिंदी एक समुद्र है। हमारी बोलियां और क्षेत्रीय भाषाएं सभी नदियां हैं। ये सारी इसी में मिलकर हिंदी को समृद्ध करती हैं। इन बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं को हटा दिया जाए तो हिंदी अपने आप में कुछ भी नहीं है।
डा.पूनम सिंह, साहित्यकार।

बहुसांस्कृतिक देश भारत में कदम - कदम पर बोलियां बदल जाती हैं। विविधता से भरे देश में हिंदी ने हमेशा एक सेतु का कार्य किया है। आज विश्व के 200 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए भाषा का समृद्ध होना अनिवार्य है।
डा.संजय पंकज, साहित्यकार।
