समस्तीपुर, जासं। भाषा कोई छाता या ओवरकोट नहीं जिसे मांग-चांग के काम चलाया जाए। यह तो वह आईना है जिसमें उस देश की आत्मा, वैचारिक प्रबुद्धता और संस्कृति की गहरी जड़ें दिखाई देती हैं। किंतु आज सामाजिक रीतियों, अभिवृत्तियों एवं मूल्यों में विषम ढंग से परिवर्तन हो रहा है। पश्चिमी देशों की प्रवृत्तियां हावी हो रही हैं। इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण है हिन्दी से हो रही विरक्ति और अंग्रेजी के प्रति लगाव। नतीजा यह है कि 'मैला-आंचल' की 'कमली' अब नहीं रही और 'बिरंचीदास' का इंतकाल हो गया। गोदान के 'होरी' की जगह 'हैरिपोर्टर' और 'आयरन मैन' अब लोगों के आदर्श बनने लगे। 'ओरहा' (भुट्टा) पर 'पिज्जा' संस्कृति हावी हो गई है, 'भूईयां' (जमीन) में बैठकर खाना बंद कर 'बफे' संस्कृति के गुलाम हो गए हैं।

युवाओं में हिंदी के प्रति घट रही अभिरुचि से चिंतित हैं साहित्यकार

नई पीढ़ी में हिंदी के प्रति अभिरुचि घट रही है। इसका मुख्य कारण जो भी हो किंतु यह देश के लिए चिंताजनक है। हम पाश्चात्य संस्कृति की ओर अंधी दौड़ में शामिल होते जा रहे हैं। नतीजा यह है कि हमारी संस्कृति विलुप्तावस्था की कगार पर पहुंच चुकी है। हमारी संस्कृति अत्यंत प्राचीन है। हिंदी का उद्गमस्थल भी वही है। कंप्यूटर तथा विभिन्न इंटरनेट मीडिया से लेकर अन्य संसाधनों तक में अंग्रेजी का प्रयोग धड़ल्ले हो रहा है। छोटा से छोटा और बड़ा से बड़ा मैसेज लोग अंग्रेजी में ही लिखते हैं। और तो और यदि भाषा हिंदी भी रहती है तो लिपि अंग्रेजी ही होती है। यह भाषा की समृद्धि के लिए घातक है। इससे बचना होगा और युवाओं को हिंदी के प्रति प्रेरित करना होगा। -ज्वाला सांध्यपुष्प, साहित्यकार, पटोरी

हिंदी के विलुप्त होने से मर जाएगी देश की आत्मा

हिंदी में मानव मूल्यों का आकलन होता है। इसमें जीवन मूल्यों की मौलिकताएं होती हैं और आडंबर का लेश मात्र भी नहीं होता। इसे समृद्ध करना अब लोगों की प्रमुख जिम्मेदारी है। इसके विलुप्त होने से देश की आत्मा मर जाएगी, संस्कारों की अंत्येष्टि हो जाएगी। पाश्चात्य संस्कृति हावी होती जा रही है। हिंदी, जो सभ्यता संस्कृति की आत्मा है, उसे अपने ही लोगों के द्वारा नकारा जा रहा है।- अश्विनी कुमार आलोक, साहित्यकार, मोहनपुर

कहते हैं युवा

सेतु नमन कहते है कि इन दिनों अंग्रेजी साहित्य का प्रचलन युवाओं के बीच बढ़ा है। इसका मुख्य कारण यह है कि इंटरनेट और मोबाइल के जरिए हिंदी साहित्य की जगह लोग अंग्रेजी साहित्य को अधिक तरजीह देने लगे हैं। संचय लाल ने कहा कि इंटरनेट मीडिया पर हिंदी साहित्य से अधिक अंग्रेजी साहित्य का प्रचार-प्रसार हो रहा है। अतः दूर- देहात में रहने वाले लोग भी इन पाश्चात्य साहित्य के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। हमारे हिंदी साहित्य को भी अधिक से अधिक प्रचारित और प्रसारित करने की आवश्यकता है। आयुष अमन कहते है कि कुछ ऐसे हिंदी साहित्य हैं जो काफी अधिक उत्कृष्ट हैं। आम लोगों तक यह साहित्य पहुंच नहीं पा रहा है, जबकि अंग्रेजी साहित्य आसानी से आम लोगों तक पहुंचता है। साक्षी शैवाल कहती है कि लोगों में अब पढ़ने- लिखने की प्रवृति घटती जा रही है। इंटरनेट और मोबाइल के जरिए लोग अंग्रेजी भाषा के साहित्य से तो जुड़ जाते हैं किंतु हिंदी साहित्य से नहीं। ऐसे उत्कृष्ट साहित्य को आम जन तक पहुंचाना भी हिंदी सेवियों का कर्तव्य होना चाहिए।

हिंदी के प्रति छात्रों का रुझान कम होना सर्वाधिक घातक

हिंदी के प्रति छात्रों का रुझान कम होने से आरती जगदीश महिला महाविद्यालय के प्राचार्य व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. शिशिर कुमार शर्मा भी चिंतित हैं। कहते हैं- हिंदी भाषा के प्रति छात्रों का रुझान कम होता जा रहा है। यह सिर्फ एक विषय के रूप में ही लेकर पढ़ा जाता है, इसमें अभिरुचि नहीं होती। अन्य विषयों की पढ़ाई पूरी एक साल तक करने के बाद लोग परीक्षा में शामिल होते हैं, जबकि हिंदी विषय सिर्फ 10 से 15 दिनों तक पढ़कर किसी तरह इसमें सिर्फ उत्तीर्णांक ही प्राप्त करना चाहते हैं। नतीजा यह है कि अंग्रेजी का कोचिंग आपको हर गली, मोहल्ले, चौक-चौराहे पर मिल जाएगा। किंतु अब न तो हिंदी पढ़ने वाले मिलते हैं और न ही हिन्दी पढ़ाने वाले। यह भविष्य के लिए और विशेष रूप से हिंदी भाषा के लिए काफी खेद जनक है।