मुजफ्फरपुर, जेएनएन। निजी बीएड कॉलेजों के फीस निर्धारण के मामले में पटना हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना के आरोप में बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अमरेंद्र नारायण यादव की मुश्किलें बढ़ गई हैं। हाइकोर्ट के आदेश को अपने ढंग से मोडिफाइ कर एक लाख दो हजार रुपये फीस तय करने के मामले को संज्ञान में लिया है। उन्हें अपना पक्ष रहने के लिए दो हफ्ते की मोहलत मिली है।

 कोर्ट ने इनकी नियुक्ति प्रक्रिया और शैक्षणिक योग्यता पर भी सवाल उठाया है। बिहार विश्वविद्यालय से संबद्ध निजी बीएड कॉलेजों के एसोसिएशन की ओर से दायर अवमानना वाद की सुनवाई करते हुए शुक्रवार को न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह की अदालत ने ये टिप्पणी की। बीएड कॉलेजों के अधिवक्ता सुमन कुमार ने यह जानकारी दी। एसोसिएशन के सचिव डॉ. श्यानंदन यादव व प्रवक्ता राजीव रंजन ने कहा कि कुलपति की मनमानी के चलते ही विद्यार्थी उग्र हो गए और जगह-जगह हंगामे पर उतर आएं।

बीएड कॉलेजों ने दी थी चुनौती

राज्य सरकार के फीस तय करने के फैसले को निजी बीएड कॉलेजों ने हाइकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि सरकार को फीस निर्धारण करने का अधिकार नहीं है। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह की एकलपीठ ने अपने फैसले में फीस का निर्धारण किया था। मगर बिहार विश्वविद्यालय इस मामले में इकलौता है जिसने हाइकोर्ट के आदेश से इतर जाकर अपने ढंग से एक कमेटी गठित कर एक लाख दो हजार रुपये फीस लेने का आदेश जारी कर दिया।

कुलपति से मांगा गया इन सवालों के जवाब

इसी के खिलाफ प्राइवेट कॉलेज फिर हाइकोर्ट चले गए और अवमाननावाद (एमजेसी 5061/18) का मुकदमा दायर कर दिया। अधिवक्ता ने बताया कि 43 नंबर सीरियल पर यह केस था जिसकी सुनवाई के बाद हाइकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की।

 कुलपति से जवाब में मांगा गया है कि आखिर कैसे उन्होंने यह काम किया, क्या सोचकर किया, किस पावर के अंतर्गत किया? उन्हें बताना होगा कि राजभवन व शिक्षा विभाग के आदेशों का उल्लंघन कैसे किया? जबकि, हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी लगाकर राजभवन, शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय को भेजी गई थी।

 

Posted By: Ajit Kumar

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