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सीतामढ़ी [रविभूषण सिन्हा]। सीतामढ़ी-शिवहर जिले के ग्रामीण इलाकों में सदियों से यह कहावत प्रचलित है, 'जब बागमती हंसती है तो जार-जार रोते हैं लोग'। सीतामढ़ी-मुजफ्फरपुर रेलखंड के न्यू रुन्नीसैदपुर रेलवे स्टेशन पर बाढ़ पीडि़तों को देख यह कहावत शत-प्रतिशत सही लगती है। यहां के बाशिंदों की खुशियां 14 जुलाई से बागमती मईया की 'अट्टहास' में गुम हो चुकी हैं। घर, सामान, अनाज, फसलें बागमती की भेंट चढ़ गई हैं। अब रेलवे स्टेशन ही सहारा है।  

जेहन बागमती मईया के मर्जी...
बारिश के बाद की चिलिचलाती धूप से बचने के लिए छांव की तलाश। पुरवइया हवा के झोंकों से थोड़ी राहत। स्टेशन परिसर और आसपास ङ्क्षजदगी की जद्दोजहद से जूझते लोग। हम पर नजर पड़ते ही वृद्ध महिला पुचिया देवी कहती हैं, कथी तकईछी। तमाशा देखे अईली ह। बताने पर कि अखबार से आए हैं। यह जानने कि कैसे रह रहे, सरकार और प्रशासन से क्या मदद मिली? इस पर अचानक भड़क उठती हैं 75 वर्षीय बाल केसरी देवी। कहती हैं, कौनो की देतई। सब त अपने भुखाएल रहई छई। सब बिलट गेलई। करजो-पंईचा कोई देवेला तइयार न हय। जेहन बागमती मईया के मर्जी...। सब बर्बाद हो गेलई। कुछो न बचलई। यह कहना था बुजुर्ग रामदास का।

सबकी कहानी एक जैसी
यहां प्लास्टिक के तंबू में कराहते 80 वर्षीय मौजे पासवान सख्त बीमार हैं। इन्हें समुचित इलाज और दवा की जरूरत है। अभी तक कोई सरकारी कर्मी हाल पूछने नहीं आया है। इन्हें सिर्फ भगवान पर भरोसा है। यहां रुन्नीसैदपुर प्रखंड के दर्जनभर गांवों के लोग शरण लिए हैं। सरकारी मदद के नाम पर कुछ नहीं मिला है। स्टेशन परिसर और आसपास ङ्क्षजदगी की जद्दोजहद से जूझ रहे हैं। चार दिनों बाद शुक्रवार की शाम से सामुदायिक रसोई की शुरुआत की गई। रेलवे स्टेशन पर अस्थायी तंबू में शरण लिए शिवजी पासवान, सुशीला देवी, सुबोध मंडल, सुनीता देवी, चुल्हिया देवी, शांति देवी और रेखा देवी सहित सैकड़ों लोगों की कहानी एक जैसी है। इन लोगों में सरकार और प्रशासन के प्रति आक्रोश है। उनका कहना है कि अब तक उनकी सुध लेने कोई नहीं पहुंचा है।

Posted By: Rajesh Thakur

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