मुजफ्फरपुर (जेएनएन)। इनके हाथ में जादू है। मधुबनी पें¨टग शैली में बालू व फेविकॉल की सहायता से प्रतिमा बनाती हैं। देश के कई जगहों पर प्रदर्शनी लगा चुकी हैं। साथ ही कागज पर देवी-देवताओं की पेंटिंग भी बनाती हैं। अपना यह हुनर अन्य को सिखा रही हैं। यह प्रतिभावान कलाकार हैं मधुबनी के रहिका प्रखंड के सतलखा डीह टोल निवासी चंदा वत्स।

बड़ी होने पर बचपन के शौक भरी कल्पना की उड़ान

किसान परिवार में जन्मी 32 वर्षीय चंदा को बचपन से ही मिट्टी की मूर्ति बनाने का शौक था। वे गांव में कृष्ण जन्माष्टमी पर अपने हाथों से मूर्ति बनाती थीं। बड़ी होने पर बचपन के शौक ने कल्पना की उड़ान भरी तो मधुबनी पें¨टग शैली की प्रतिमा बनाने का निर्णय लिया। इसके बाद बालू व फेविकॉल के मिश्रण से मूर्ति बनाने पर काम शुरू किया। सबसे पहले मां सरस्वती की डेढ़ फुट लंबी मूर्ति बनानी शुरू की। इसे 20 दिनों में पूरा कर सकीं। इसके बाद तो उन्होंने कई मूर्तिया बनाई तो कला निखरने लगी।

स्केच से रेखाकृति बना मूर्ति का देतीं आकार

कोई भी मूर्ति बनाने से पहले वे प्लाइबोर्ड पर स्केच से उसकी रेखाकृति बनाती हैं। फिर मिट्टी की जगह बालू और फेविकॉल के मिश्रण से हाथ, पैर व आंख सहित अन्य अंग बनाती हैं। जो भी कमी होती है, उसे बांस की कमची से दूर करती हैं। मूर्ति जब पूरी तरह तैयार हो जाती है तो मधुबनी शैली में पें¨टग करती हैं। इसके बाद इसे शीशे के फ्रेम में जड़ दिया जाता है। तकरीबन 16 साल से इस शैली में मूर्ति बनाने वाली बीए पास चंदा कहती हैं कि इसमें धैर्य की जरूरत होती है। काफी बारीक काम है।

दाम अधिक होने के कारण कम मिलते खरीदार

चंदा ने दो साल पहले ऐसी मूर्तियों की बरेली में प्रदर्शनी लगाई थी। वहां तीन मूर्तियों की बिक्री हुई। बड़ी मूर्ति की सराहना तो लोगों ने की, लेकिन दाम अधिक होने के कारण खरीदार नहीं मिला। दो फुट वाली मूर्ति लगभग 20 से 25 हजार की है। छोटी आठ से दस हजार में बिक जाती है। एक बेटे की मां चंदा परिवार का कामकाज करने के साथ इस कठिन कला साधना में लगी हैं। बेटा अभी छोटा है, इस कारण प्रदर्शनी लगाने बाहर नहीं जा पातीं।

कला का जितना होगा विस्तार , उतना मिलेगा फायदा

चंदा से यह कला एक दर्जन से अधिक महिलाएं सीख चुकी हैं। इस समय इतनी ही लड़कियों को सिखा रही हैं, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। कहती हैं, किसी कला का जितना विस्तार होगा, उतना ही फायदा मिलेगा। इस कला को सीखने वाली कलावती कुमारी, हीना व ममता का कहना है कि इस पर काम करना कठिन है। इससे सीखकर वे रोजगार से जुड़ सकेंगी।

अन्य के रोजगार का भी बन सके साधन

मधुबनी पेंटिंग की नामचीन कलाकार डॉ. रानी झा कहती हैं, चंदा जो काम कर रहीं, वह अनूठा है। उन्हें प्रोत्साहन मिलना चाहिए, ताकि यह कला विस्तारित हो और अन्य के रोजगार का साधन बन सके।

Posted By: Jagran