मुजफ्फरपुर, जेएनएन। 'लहरों को साहिल की दरकार नहीं होती, हौसला बुलंद हो तो कोई दीवार नहीं होती, जलते हुए चिराग ने आंधियों से ये कहा, उजाला देने वालों की कभी हार नहीं होतीÓ... मन में इस तरह की भाव लेकर कानूनी जागरूकता व सहायता की पहल कर रही हैं जिला बार एसोसिएशन की उपाध्यक्ष डॉ.संगीता शाही। ऐसे आया बदलाव का विचार 

 डॉ.शाही बताती हैं कि बात 1997 की है। पढ़ाई पूरी करने के बाद वकालत शुरू करने के दौरान व्यवहार न्यायालय आने लगी। सीनियर के साथ कोर्ट में पैरवी करने तथा न्यायिक सिस्टम को समझने का सिलसिला शुरू हुआ। सुबह काम खत्म होने के बाद दोपहर में सीजेएम कोर्ट से बाहर निकल बढ़ी। नगर निगम गेट के पास एक बुजुर्ग महिला बच्ची के साथ बैठकर रो रही थी। अचानक उस पर पर नजर पड़ी। मन में विचार आया कि कुछ बात कर लें। पहले तो वह कुछ बोलने को तैयार नहीं हुई।

 काफी समझाने के बाद बोली- हमारा एक बेटा था जिसकी आमदनी से परिवार चल रहा था। वह पिछले पांच साल से जेल में बंद है। परिवार पर संकट है। अब खुद गांव में कुछ-कुछ कमाकर पैसा बचा केस लड़ रही। उसका पूरा पता लेकर तीसरे दिन मिलने के लिए बुलाई। उसकी बात सुनकर मन यह सोचकर भारी हो गया कि चोरी के आरोप में जितने दिन इसका बेटा जेल में है अगर इसको सजा भी हुई हो तो तो जेल से रिहा हो गया होता। वृद्धा को मदद मिली उसका बेटा जेल से बाहर आया। 

 वहीं संकल्प ली कि जब तक वकालत करना है इस तरह के गरीब, जरूरतमंद को मुफ्त कानूनी मदद करना है ताकि लोगों को भरोसा कानून के प्रति मजबूत हो। 

इस तरह से चल रहा अभियान 

डॉ.संगीता कहती हैं कि पिछले 22 साल से लगातार वकालत में हैं। इस दौरान विधि सलाह व सुलह केंद्र, जिला लोक अदालत सदस्य के रूप में सेवा दी है। विभिन्न प्रखंड़ों में जाकर गोष्ठी के माध्यम से लोगों को कानूनी अधिकार बताने व मदद करने का सिलसिला चल रहा है। गरीबों को कानूनी मदद दिलाने के अभियान में विधिक जागरूकता शिविर, लोक अदालत, सुलह सलाह केंद्र से काफी मजबूती मिल रही है। इसके साथ 2008 से अपर लोक अभियोजक के रूप में सरकार की ओर से न्यायालय में अपराधियों को सजा दिलाकर पीडि़तो को न्याय दिला रही है।

Posted By: Ajit Kumar

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