मुजफ्फरपुर : स्वाभिमान के प्रतिमान महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री पीढि़यों के निर्माता थे। आजीवन संघर्षो से जूझते रहने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनका सृजन संघर्षो की महागाथा है। ये बातें मंगलवार को उनकी पुण्यतिथि पर वीडियो कांफ्रेंस के जरिए हुए महावाणी स्मरण में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.संजय पंकज ने कहीं। कहा कि आचार्यश्री गीत-कविता के साथ ही साहित्य की अन्य विधाओं में भी निरंतर लिखते रहे। उनका बहुमूल्य लेखन हिन्दी भाषा व साहित्य का ऐश्वर्य है। बताया कि कोरोना संक्रमण को देखते हुए किए गए लॉकडाउन का अनुपालन करते हुए वीडियो कांफ्रेंस के जरिए कार्यक्रम किया गया है। यह बड़ा ही अभिभूत करने वाला पल है। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.शिवदास पाडेय ने कहा कि आचार्यश्री की पीड़ा और जिजीविषा दोनों ही विमुग्ध करने वाली है। छायावाद की श्रेष्ठता को आत्मसात कर उन्होंने गीत विधा को जो ऊंचाई दी, वह अनुपम है। कवयित्री डॉ.इंदु सिन्हा ने कहा कि शास्त्री जी की रचनाओं में जीवन-मूल्य और शाश्वत सत्य के स्वाभाविक दर्शन हैं। बहुभाषाविद् और गंभीर अध्येता शास्त्रीजी साहित्य की धरोहर हैं। डॉ.विजय शकर मिश्र ने आचार्यश्री की लोकप्रिय रचना 'जिन्होंने हो तुझे देखा नयन वे और होते हैं, कि बनते वंदना के छंद क्षण वे और होते हैं' को सस्वर सुनाकर सबको भाव विभोर कर दिया। डॉ. पूनम सिंह ने अपने गीत 'सास्कृतिक शहर मुजफ्फरपुर के, तुम थे पावन धाम। तीर्थ रहा घर तेरा हरदम, शत शत तुझे प्रणाम।' के माध्यम से आचार्यश्री को स्मरण किया। युवा गीतकार कुमार राहुल, कवयित्री डॉ.कुमारी अनु, कवि श्यामल श्रीवास्तव, देवेंद्र कुमार, सत्यनारायण मिश्र मयंक, उदय प्रसाद सिन्हा, डॉ. ब्रजभूषण मिश्र, ललन कुमार, वीरेंद्र वीरेन, प्रवीण कुमार मिश्र, ठाकुर विनय कुमार शर्मा आदि ने भी अपनी रचना सुनाई। कांफ्रेंस पर चेन्नई से ईश्वर करुण, ग्वालियर से मुरारीलाल गीतेश, मोहिउद्दीन नगर से हरिनारायण सिंह हरि आदि भी थे। आभार एचएल गुप्ता व धन्यवाद जयमंगल मिश्र ने किया।

Posted By: Jagran

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