मुजफ्फरपुर, जासं। कोरोना ने पिता के साये से मरहूम कर जिंदगी की खुशियां छीन लीं। सिस्टम का पेच सरकारी मरहम की राह में बाधा बन गया। नतीजा पिता के साये से मरहूम पांच बच्चों के दर्द पर सरकारी मरहम नहीं लग पा रहा है। मृत्यु प्रमाणपत्र नहीं बन पाने व बैंक खाता नहीं खुलने से सभी बच्चे बाल संरक्षण इकाई की बाल सहायता योजना से वंचित हैैं। जूरन छपरा रोड नंबर चार में रहने वाले अभिषेक सिन्हा की मृत्यु कोरोना से 12 मई 2021 को एसकेएमसीएच में हो गई थी। पांच वर्ष पूर्व मां शिप्रा सिन्हा की भी मौत हो चुकी थी। मां को खो चुकीसौम्या कुमारी (19), साइका (15), पलक सिन्हा (13), अभिनव शिवांग (05), अनय सिन्हा (06) पर पिता के निधन से दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। चाचा अविनाश कुमार व चाची ज्योति गुंजन ने पांचों बच्चों को संभाला। सभी बच्चे फिलहाल वैशाली जिले के चकबाजा गांव में चाचा-चाची के साथ रह रहे हैं।

प्रमाणपत्र को आरटीपीसीआर रिपोर्ट मांग रहा एसकेएमसीएच

मृतक की बड़ी पुत्री सौम्या कुमारी कहती हैं कि एसकेएमसीएच से कोरोना से डेथ का सर्टिफिकेट नहीं मिल रहा है। वहां आरटीपीसीआर रिपोर्ट मांगी जा रही है। कोरोना से पीडि़त होने पर उन्हें एसकेएमसीएच में भर्ती कराया गया था और वहीं उनका निधन हो गया था। छोटे भाई-बहनों का ज्वाइंट बैंक खाता नहीं खुल पा रहा है। उसने कहा कि अब तक कोई सरकारी सहायता नहीं मिली है।

बालिग होने तक 1500 प्रतिमाह मिलने का प्रावधान

बाल संरक्षण इकाई की बाल सहायता योजना के तहत कोरोना से पिता के मरने पर हर बच्चे को बालिग होने तक 1500 रुपये प्रतिमाह देने का प्रावधान है। यह राशि अभिभावक व बच्चे के संयुक्त खाते में दी जाती है। जिला बाल संरक्षण पदाधिकारी चंद्रदीप कुमार ने कहा कि बाल सहायता योजना के लाभ के लिए कोरोना से मरने का प्रमाणपत्र व ज्वाइंट बैंक खाता जरूरी है। ये दोनों कागजात नहीं देने से योजना का लाभ मिलने में विलंब हो रहा है। 

Edited By: Ajit Kumar