मुजफ्फरपुर, [प्रेम शंकर मिश्रा]। शहर की एक कुर्सी हमेशा चर्चा में रहती है। हाल के दिनों में कुर्सी के साथ इसके दावेदार भी चर्चा में हैं। यह इसलिए कि वे दावेदार तो हैं, मगर फरार भी चल रहे हैं। चार साल से कुर्सी को कांटों के ताज की तरह संभालने वाले इसे खोने के डर से फरार हैं। उन्हें मुनादी करके बताया जा रहा है कि कुर्सी बचानी है तो सामने आइये, मगर वे आने को तैयार नहीं। उन्हें लग रहा कि गायब रहे तभी कुर्सी बची रहेगी। वहीं दूसरे दावेदार के पीछे पुलिस लगी है। आरोप शराबबंदी कानून को ठेंगा दिखा जाम छलकाने का है। इससे वे भी फरार हैं। इन दावेदारों की फरारी के बाद भी नेपथ्य से कुर्सी के खेल की पटकथा लिखी जा रही है। इसमें ऐसे पात्रों को निशाना बनाने की तैयारी है जो दावेदारों को मदद पहुंचा रहे। देखते हैं ऊंट किस करवट बैठता है।

अतिक्रमण से इतना प्यार, कुछ तो है बात

अगर आपको किसी चीज से प्यार हो तो इसका कोई कारण जरूर होगा। कम से कम लगाव तो होगा ही। कुछ यही बात शहर में अतिक्रमण-अतिक्रमणकारी और पुलिस-प्रशासन के बीच है। इन दोनों में इतना प्यार है कि एक-दूसरे को छोडऩा नहीं चाहते। इसका कारण तो वे ही बता सकते हैं, लेकिन शहरवासी इसे बखूबी समझ रहे हैं। उनका मानना है कि अतिक्रमण से अतिक्रमणकारियों की ही दुकान नहीं चल रही, कई स्तर तक परोक्ष या अपरोक्ष रूप से स्वार्थ सिद्ध हो रहा है। कई साहब के यहां फल-सब्जी की कमी इससे नहीं होती। कुछ अंश अर्दली और बाबू के भी हाथ लग ही जाता है। चाय-पान का खर्चा भी इससे ही निकल जाता है। इसलिए अतिक्रमणकारी भी हक जताते रहते हैं। बीच-बीच में नूरा कुश्ती भी देखने को मिलती है। एक-दो दिन रगड़ा-रगड़ी होती फिर सड़कों पर सज जातीं दुकानें।

फिर सजने लगी मंडी, होने लगा मोलजोल

त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के नतीजे आने लगे हैं। इस बार पुराने चेहरों को शिकस्त मिली है। अधिकतर नए सेहरे के सिर ताज सजा है। इन नए चेहरों पर मोलजोल शुरू हो चुका है। निकट भविष्य में इन चेहरों के पास प्रखंड, जिला एवं राज्य स्तर के माननीय को चुनने की जिम्मेदारी होगी। एक पूर्व माननीय की ओर से तैयारी शुरू कर दी गई है। खुद के अलावा जिला स्तर की एक माननीय की कुर्सी वे प्रत्येक पांच वर्ष के अंतराल पर चाहते हैं। पंचायत जनप्रतिनिधियों के यहां गुलदस्ते के साथ संदेश भेजे जा रहे हैं। कई जनप्रतिनिधि दरबार में जाकर आशीर्वाद भी प्राप्त कर चुके हैं। दरअसल उनके लिए यही बड़ा दरबार है, क्योंकि वर्षाें से मुकाबले में दूसरे नहीं आ पाए हैं। कुछ लोगों में सुगबुगाहट तो है, लेकिन उसमें गंभीरता नहीं है। समझ लीजिए कम से कम उपस्थिति तो दर्ज कराई ही जा सकती है।

ये साहब किसी की नहीं सुनते

जिले में प्रखंड स्तर के एक साहब खुद को सबसे बड़ा मानते हैैं। पंचायत चुनाव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उनके पास थी। तैयारी की समीक्षा में ही यह बात स्पष्ट हो गई थी कि चुनाव में गड़बड़ी होगी। जिला स्तर से लेकर बाहर से आए पदाधिकारी ने उन्हें आगाह भी किया, मगर फर्क नहीं पड़ा। साहब ने सभी निर्देशों को अनसुना कर दिया। वरीय पदाधिकारियों को यह आभास कराया कि वे सब संभालने की क्षमता रखते हैं। नतीजा पूरी चुनाव प्रक्रिया में गड़बडिय़ां ही सामने आईं। जिन्हें कम वोट आए वे विजेता बन गए। यहां भी शिकायत करने वालों की बात साहब ने सुनने से इन्कार कर दी। उनकी कारस्तानी से वरीय पदाधिकारी अचंभित हैं, लेकिन सीधी कार्रवाई से बच भी रहे। बताया जा रहा कि साहब की पहुंच ÓऊपरÓ तक है। वे कुछ न करें तो भी मदद में एक-दो पदाधिकारी जरूर लगा दिए जाएं।  

Edited By: Ajit Kumar