समस्तीपुर, अजय पांडेय । गबन, गोदान, वरदान, निर्मला..घर आई ‘वैशाली की नगर वधू’। लॉकडाउन में सामाजिक यथार्थ और ताने-बाने को बुनतीं कालजयी रचनाएं फिर से लौट आई हैं। इस कालक्रम में साहित्य के कद्रदानों की संख्या बढ़ गई है। इसका श्रेय जाता है कामकाजी, व्यवसायी और साहित्य प्रेमी युवाओं को। इन्होंने वाट्सएप पर ‘स्टेशनरी फैमिली ग्रुप’ बनाया है। इसका लक्ष्य उन पन्नों को सहेजना, जो दुनियादारी की समझ तले बिल्कुल अतार्किक हो चुके हैं। इस दौर में ये उनकी अहमियत और तार्किकता, दोनों को मूर्त कर रहे। साथ ही, जीवन की रचनात्मक और अनुभवों को साझा भी कर रहे। टीवी और उसकी तिलस्मी दुनिया को तोड़ सामाजिकता से रूबरू करा रहीं। 

साहित्यिक रचनाओं पर खूब हो रहा चिंतन-मनन

मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, गोपाल दास नीरज, आचार्य चतुरसेन जैसे रचनाकार आज इनके घरों में हैं। ग्रुप के सदस्य इन रचनाओं के प्रिंट और पीडीएफ फार्मेट में शेयर करते। कहानियों, उपन्यासों और कविताओं की सामाजिकता, रचनात्मकता और पृष्ठभूमि पर चिंतन-मनन होता। सदस्य अपने विचार देते। शुरू हो जाता खुशनुमा शास्नार्थ का दौर। एक-एक साहित्यकार की चर्चा होती। कथानक, पात्र और किरदार, सब एक साथ जी उठते और संवाद करते। फिलहाल ग्रुप में लगभग 150 सदस्य हैं, जिनकी संख्या हर दिन बढ़ती जा रही। 

सामाजिक यथार्थ को समझने की कोशिश

ग्रुप के अहम सदस्य मुजफ्फरपुर निवासी राजेश कंचन कहते हैं कि बेशक यह मुश्किल दौर है। हर किसी के मन में अज्ञात भय बैठा है। लेकिन, हमें इससे उबरना है। जीवन को अपने ढंग से जीना और सहेजना है। समस्तीपुर के संजय सिंह कहते हैं कि जीवन की आपाधापी में हम इन रचनाकारों से विमुख हो गए हैं।

 रचनाओं को खुद पढ़ते और बच्चों को पढ़ाते-सुनाते

ग्रुप में शामिल युवा व्यवसायी कोरोना संक्रमण की आशंका के बीच घर-परिवार के बीच संजीदगी दिखाते हैं। साझा की गई रचनाओं और कहानियों को खुद पढ़ते और बच्चों को पढ़ाते-सुनाते। उसका वीडियो तैयार करते और शेयर करते। जीवन के हर रंग को ग्रुप में साझा कर मुश्किल दौर से निकलने के लिए प्रेरित करते। इनके बच्चे इन काल्पनिक रचनाओं और पात्रों के किरदारों में रंग भरते।

इस बारे में अंग्रेजी साहित्यकार व समस्तीपुर कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ. प्रभात कुमार ने बताया कि उत्साही युवाओं की इस तरह की पहल सराहनीय है। इसे लॉकडाउन की अवधि से आगे भी ले जाने की जरूरत है। क्योंकि, साहित्य सेवा समयकाल से आगे की विषयवस्तु है।

Posted By: Murari Kumar

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