मुजफ्फरपुर। यह सुनकर अटपटा लगता है कि खुद का प्रिंटिंग प्रेस रहते बीआरए बिहार विश्वविद्यालय में छपाई दूसरी एजेंसियों पर निर्भर है। थोड़े खर्च से प्रेस चालू हो सकता है, मगर अधिकारियों का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। इसे अपडेट कर दिया जाए तो छपाई के सभी काम आसान हो जाएंगे। इसके चालू नहीं होने से विवि को क्षति उठानी पड़ रही है। एक तो प्राइवेट एजेंसियों पर निर्भरता है और समय पर काम भी नहीं हो पाता। दूसरी, फिजूलखर्ची भी बढ़ गई है। विवि द्वारा विभिन्न तरह की जरूरतों के हिसाब से निजी प्रिंटिंग प्रेस में छपाई कराने व इसमें अलग-अलग दर, अपारदर्शिता और सरकारी प्रेस से अधिक दर पर छपाई होने की शिकायत राजभवन को मिली हैं। संभव है बहुत जल्द प्रेस से छपाई के मामलों की जाच भी हो।

सबकुछ छपता था विवि के प्रेस में

बजट की प्रस्तावना, कई तरह के फॉर्म, फ्लाई लीफ और कुछ सामान्य चीजों की छपाई इस प्रेस में होती थी। गुपचुप तरीके से अब भी कुछ चीजों की छपाई स्थानीय प्रेस में कराई जाती है। लेकिन बजट, कवर, फ्लाई लीफ से लेकर अन्य कई तरह की छपाई ज्यादातर विवि निजी प्रेस में कराते रहे हैं। कभी विवि प्रेस में कॉपियों की छपाई भी होती थी, लेकिन अर्से से स्थानीय स्तर पर ही छपाई होती रही है।

टीआर व अंकपत्र छापने का सुर्खियों में रहा है विवाद

टीआर एवं अंकपत्र छापने का विवाद अप्रैल में ही सुर्खियों में रहा। यह भी उजागर हुआ कि कैसे छपाई के लिए विवि के अंदर खेल चल रहा था। 2017 के टीडीसी पार्ट वन, टू व थ्री का टीआर एवं अंकपत्र छापने का जिस एजेंसी को आदेश नहीं था वह एक गलत नोटशीट का हवाला देकर दबाव बना रही थी। विवि का तर्क था कि पर्चेज एंड सेल कमेटी ने पहले ही फ्रेश टेंडर के जरिए 2017 का टीआर एवं अंकपत्र छापने का आदेश जारी कर रखा था। छात्र हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रदेश प्रवक्ता सह विश्वविद्यालय अध्यक्ष संकेत मिश्रा ने कहा कि खुद का प्रिंटिंग प्रेस है तो उसे दुरुस्त क्यों नहीं कराया जा रहा है।

बयान

प्रेस को अपग्रेड व आधुनिकीकरण के लिए उसकी पड़ताल की जा रही है। यह सही है कि प्रेस सहीं ढंग से चालू हो जाए तो विवि का काम न सिर्फ आसान हो जाएगा, बल्कि छपाई खर्च भी काफी कम हो जाएगा।

-डॉ. रजनीश कुमार गुप्ता

प्रेस अधीक्षक, बीआरएबीयू

Posted By: Jagran

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