मुजफ्फरपुर, जेएनएन। अस्पतालों से निकलने वाले बायो मेडिकल वेस्ट का अस्पताल प्रबंधन द्वारा उचित प्रबंधन व निष्पादन नहीं किया जाता। उनको खुले मैदान में आम कचरे के साथ फेंक लोगों को बीमार किया जा रहा है। बायो मेडिकल कचरा स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए अत्यंत खतरनाक है। इससे न केवल बीमारियां फैलती है बल्कि जल, थल एवं वायु सभी दूषित होते हैं। जिले में श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पातल, सदर अस्पताल समेत पांच हजार से अधिक सरकारी एवं गैरसरकारी अस्पताल एवं क्लीनिक हैं। प्रतिदिन इन अस्पतालों से बड़ी मात्रा में बायो मेडिकल वेस्ट निकलता है। ऐसे कचरे से वायरस संक्रमण, एचवाइवी, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियां होने का डर बना रहता है।

निष्पादन को पहुंचता सिर्फ ढाई से अस्पतालों का कचरा

जिले के अस्पतालों से निकलने वाले बायोमेडिकल वेस्ट के सुरक्षित निष्पादन की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग द्वारा मेडीकेयर इनवयरमेंटल मैनेजमेंट प्रालि नामक एजेंसी को दी गई है। एजेंसी को अस्पतालों से निकलने वाले वेस्ट को प्रतिदिन एकत्रित करना एवं नष्ट करने का काम मिला है। एजेंसी सूत्रों के अनुसार 17 सरकारी अस्पतालों के अलावा ढाई सौ निजी अस्पतालों से करीब आठ सौ किग्रा कचरे का निष्पादन किया जा रहा है। जबकि स्वास्थ्य विभाग का आंकड़ा बताता है कि जिले में 672 निबंधित और पांच हजार से अधिक गैर निबंधित अस्पताल एवं क्लीनिक हैं। उनमें से सिर्फ ढाई सौ का ही कचरा निष्तारण को पहुंचता है। शेष अस्पताल मेडिकल कचरे को खुले में फेंक रहे हैं।

पांच साल कैद और जुर्माने का प्रावधान

अधिकार के निदेशक अधिवक्ता धीरज कुमार बताते हैं कि मेडिकल कचरे को खुले में फेंकना और जलाना पर्यावरण संरक्षण एक्ट 2016 के तहत अपराध है। दोषी पाए जाने पर पांच साल तक की जेल या एक लाख तक जुर्माना का प्रावधान है। लेकिन यह कानून कागज पर है और जमीन पर खुले आम मेडिकल वेस्ट फेंका जा रहा है।

संक्रमण का करण बन सकता बायो मेडिकल वेस्ट

डॉ. फिरोजुद्दीन फैज कहते हैं कि अस्पतालों से निकलने वाला मेडिकल कचरा खतरनाक है। इस कचरे में कई तरह की बीमारियों से ग्रस्त मरीजों के उपयोग में लाए गए इंजेक्शन, आइवी सेट व बोतलें आदि होतीं हैं। जरूरत इस बात की है कि मेडिकल वेस्ट का उचित निष्पादन किया जाए। लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।  

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