बिहार में मिट्टी के बर्तनों पर उकेरी कला, कुम्हारों के हुनर को अमेरिका-यूरोप तक मिला बाजार
Indian Handmade Terracotta Products : मुजफ्फरपुर में उद्यमी डॉ. ऋतुराज की पहल से पारंपरिक कुम्हारी कला को आधुनिक रूप दिया ...और पढ़ें

Muzaffarpur Pottery Art : मिट्टी के बर्तनों पर उकेरी कलाकृतियों के साथ उद्यमी डा. ऋतुराज।
HighLights
डॉ. ऋतुराज की पहल से कुम्हारी कला का पुनरुत्थान।
मिट्टी के बर्तनों पर मिथिला सहित विविध कला शैलियां।
उत्पाद अमेरिका, ब्रिटेन जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचे।
अमरेन्द्र तिवारी, मुजफ्फरपुर। Pottery Art Export to USA and Europe :मिट्टी के बर्तनों पर जब मिथिला पेंटिंग और दूसरी कलात्मक शैलियों के रंग उभरते हैं, तो पारंपरिक कुम्हारी कला को नई पहचान मिलती है।
मुजफ्फरपुर में इसी हुनर को आधुनिक स्वरूप देकर कुम्हारों की आर्थिक स्थिति बदलने की पहल की जा रही है। उद्यमी डा. ऋतुराज की पहल पर मिट्टी के घड़े, कलश, कुल्हड़, दीप, कटोरी, गिलास, हुक्का और धूपदानी जैसे उत्पादों को कलात्मक रूप दिया जा रहा है। इनकी मांग अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और आस्ट्रेलिया तक पहुंच चुकी है।
43 कुम्हार जुड़े, 20 को प्रशिक्षण
डा. ऋतुराज की संस्था दी चाक एंड वीक पारंपरिक कुम्हारी कला के पुनरुत्थान में जुटी है। इस पहल से जिले के 43 कुम्हार जुड़ चुके हैं। वहीं, 20 लोगों को मिट्टी के बर्तनों पर चित्रकारी का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बच्चों, महिलाओं और वयस्कों को हुनर सिखाकर स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
मिट्टी के बर्तनों पर दिखती विविध कला
कारीगर बर्तनों पर लता-बेल, फूल-पत्तियां, पशु-पक्षी, शिकार और विभिन्न कथाओं से जुड़े चित्र उकेर रहे हैं। मिथिला और मधुबनी चित्रकला के साथ मथुरा, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, ईरान, ग्रीस, रोमन और गोथिक कला शैलियों का समन्वय किया जा रहा है। इससे पारंपरिक बर्तनों को नया रूप मिल रहा है और बाजार में उनकी आकर्षकता बढ़ रही है।
हर महीने एक लाख रुपये से अधिक का कारोबार
मुशहरी, कांटी, रामबाग चौरी और मस्जिद चौक सहित आसपास के क्षेत्रों के परिवार इस पहल से जुड़े हैं। कारीगर हर महीने करीब एक से सवा लाख रुपये तक के तैयार उत्पादों का कारोबार कर रहे हैं। इससे 25 से 30 प्रतिशत तक आमदनी हो रही है।
विदेश में रहने वाले जिले के लोगों के स्वजन भी यहां तैयार उत्पाद खरीदकर उन्हें भेजते हैं। इस तरह स्थानीय हुनर को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने का रास्ता खुल रहा है।
हजारों साल पुरानी परंपरा को नई पहचान
डा. ऋतुराज के अनुसार, गंगा, सरयू और गंडक के बीच का क्षेत्र मृद्भांड कला की समृद्ध परंपरा का केंद्र रहा है। उनका कहना है कि ईसा पूर्व करीब 9000 से 7000 वर्ष पहले से मिट्टी के बर्तनों पर कलात्मक अभिव्यक्ति सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम रही है। वह लहुरा वीर की खुदाई को इस परंपरा का ऐतिहासिक प्रमाण मानती हैं। इस विरासत को वैश्विक बाजार से जोड़ने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
जीआई टैग और सरकारी मदद की जरूरत
डा. ऋतुराज का मानना है कि कुम्हारी कला को प्रशिक्षण, औपचारिक शिक्षा और डिग्री पाठ्यक्रम से जोड़ा जाना चाहिए। गंडक किनारे के लोगों की विशिष्ट शैली में तैयार उत्पादों को संरक्षित करने के लिए सरकार को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग दिलाने की पहल करनी चाहिए। इससे कुम्हार समाज के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक विकास को गति मिल सकती है।
योजनाओं से जुड़ेंगे कारीगर
कुम्हारों को बेहतर बाजार और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना जैसी सरकारी योजनाओं से जोड़ने की जरूरत है। डा. ऋतुराज के अनुसार, वह इस दिशा में आने वाले दिनों में सरकार से मिलकर पहल करेंगी, ताकि पारंपरिक कला को संरक्षण मिलने के साथ कारीगरों की आमदनी भी बढ़ सके।
