बेतिया, जासं। पश्चिम चंपारण का एक ऐसा गांव, जहां घर-घर प्रभु श्रीराम का गुणगान है। यहां की जीवनशैली में प्रभु की लीला व्याप्त है। गांव के हर घर में राम, लक्ष्मण और सीता से लेकर रावण व अन्य की भूमिका निभाने वाले कलाकार हैं। इनकी कलाकारी और संवाद में प्रवाह इस कदर कि निभाए गए पात्रों का चरित्र और उनका व्यक्तित्व एकरूप हो जाता है। यह गांव है चनपटिया प्रखंड का महनाकुली। एक हजार की आबादी वाले इस गांव में 100 से अधिक कलाकार हैं। आसपास के इलाकों में इसे 'रामलीला वाला गांव' कहा जाता है। इसबार नवरात्र में ये लोग अपने गांव में ही रामलीला का मंचन कर रहे हैं। इससे पहले इन्होंने पूर्वी चंपारण के बखरिया गांव में मंचन किया था।

मुस्लिम कलाकार भी होते शामिल

रोजगार के लिए 30 साल पहले ग्रामीण गोपाल प्रसाद ने अजय साह, राजबली सिंह व अमेरिका भारती के साथ मिलकर आदर्श रामलीला मंडली की स्थापना की थी। एक-एक कर ग्रामीण जुड़ते गए और गांव में ही रामलीला के सभी कलाकार तैयार हो गए। अब तो नई पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। व्यवस्थापक गोपाल प्रसाद का कहना है कि वैसे तो प्रभु की लीला का मंचन वर्षभर होता है, लेकिन शारदीय नवरात्र खास होता है। इसमें मुस्लिम कलाकार भी होते हैं। साजिद अंसारी कौशल्या और हुसैन अंसारी सुमित्रा की भूमिका निभाते हैं।

बुजुर्ग कलाकार नई पीढ़ी को सिखाते संवाद कला

मंडली के अध्यक्ष अजय साह का कहना है कि गांव के बुजुर्ग कलाकार नई पीढ़ी को प्रशिक्षण देते हैं। संवाद से लेकर भाव-भंगिमा तक की बारीकियां बताते हैं। घर में भी कला का माहौल रहता है तो बच्चे देखकर भी बहुत कुछ सीख जाते हैं। आमतौर पर एक कलाकार को एक ही पात्र की भूमिका निभानी रहती है, इसलिए बार-बार के अभिनय से उनके संवाद प्रवाह में सहजता आ जाती है।

कोलकाता से मंगाया जाता परिधान व प्रसाधन

रामलीला के लिए पहले गदा, धनुष, मुकुट, माला, साड़ी, रंगीन वस्त्र, महिलाओं व पुरुषों के बाल, मुखौटा, हल्दी, रोली, चंदन आदि मोतिहारी से खरीदे जाते थे। अब यह सामान कोलकाता से मंगवाया जाता है, ताकि पहनावे को आकर्षक और मंच को भव्य बनाया जा सके। मंडली बगहा, बेतिया, मोतिहारी और इससे सटे जिलों में काफी लोकप्रिय है। गांव में मंचन के दौरान ये लोग राशि नहीं लेते, लेकिन बाहर जाने पर 60 से 70 हजार रुपये में बुकिंग होती है। इसके अलावा मंडली के सदस्यों के लिए भोजन खर्च भी देना होता है। मंचन का खर्च काटकर होने वाली आय का आपस में बंटवारा होता है। संरक्षक राजबली सिंह का कहना है कि मंडली में कुल 35 कलाकार रहते हैं। साल में कम से कम 20 बुकिंग मिल जाती है। पार्ट टाइम काम करने वाले सभी कलाकर खेती से लेकर अपना अन्य काम भी करते हैं।  

Edited By: Ajit kumar

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