बिहार के मठ-मंदिरों से चोरी! मुजफ्फरपुर में नेताओं ने ही कब्जाई प्रॉपर्टी, 11 साल बाद भी कोई एक्शन नहीं
Bihar Temple Property Encroachment: मुजफ्फरपुर में कबीर मठ की करोड़ों की जमीन पर रसूखदारों ने अवैध कब्जा कर लिया है, ...और पढ़ें

कबीर मठ की साढ़े 14 कट्ठा बेशकीमती जमीन की अवैध खरीद-बिक्री से जुड़ा है। (AI Generated Image)

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जागरण संवाददाता, मुजफ्फरपुर। Muzaffarpur Kabir Math Land: बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में मठ और मंदिरों की करोड़ों रुपये की कीमती संपत्ति को रसूखदारों ने रेबड़ी की तरह आपस में बांट लिया है।
इस खेल में कई रसूखदार जनप्रतिनिधियों ने भी अपने पद और ताकत के बल पर मठों की जमीनों पर अवैध कब्जा जमाया, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि उनके खिलाफ जांच की फाइलें वर्षों से दबी पड़ी हैं।
जांच की फाइल हुई दफन
वक्त गुजरने के साथ-साथ इन कीमती जमीनों पर रसूखदारों का कब्जा और मजबूत होता चला गया, जबकि इसके खिलाफ उठने वाली आवाजें प्रशासनिक उदासीनता के कारण दम तोड़ती गईं।
ऐसा ही एक बड़ा मामला कबीर मठ की साढ़े 14 कट्ठा बेशकीमती जमीन की अवैध खरीद-बिक्री से जुड़ा है, जिसकी 11 साल बाद भी जांच नहीं हो सकी।
पूर्व जनप्रतिनिधि पर आरोप
शहरी क्षेत्र में स्थित कबीर मठ की इस जमीन को एक पूर्व जनप्रतिनिधि और उनकी बेटी के नाम पर वर्षों पहले नियमों को ताक पर रखकर बेच दिया गया था।
मामला जब उजागर हुआ, तो साल 2015 में तत्कालीन बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद के अध्यक्ष किशोर कुणाल ने इस महाफर्जीवाड़े के खिलाफ सीधे मोर्चा खोला था।
डीएम को लिखा था पत्र
तत्कालीन अध्यक्ष किशोर कुणाल ने मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी (DM) को एक आधिकारिक पत्र भेजकर कबीर मठ की जमीन की रजिस्ट्री में बड़े पैमाने पर जालसाजी होने का दावा किया था।
उन्होंने स्पष्ट किया था कि इस जमीन की बिक्री के लिए धार्मिक न्यास पर्षद से कोई अनिवार्य अनुमति नहीं ली गई थी।
फर्जी दस्तावेज का खेल
जांच में यह बात सामने आई थी कि जमीन की रजिस्ट्री के लिए जो पत्र प्रस्तुत किए गए थे, वे पूरी तरह संदिग्ध और फर्जी थे। जिस पत्रांक का हवाला देकर कबीर मठ के तत्कालीन महंत के नाम से अनुमति पत्र जारी दिखाया गया था, हूबहू उसी पत्रांक से एक दूसरा पत्र जिलाधिकारी नवादा को भी भेजा गया था।
न्यायालय की अनुमति गायब
नियमों के अनुसार, सिर्फ न्यास पर्षद की सहमति मात्र से किसी भी मठ की जमीन की बिक्री नहीं की जा सकती है। इसके लिए संबंधित जिले के जिला जज (District Judge) की कानूनी स्वीकृति होना अनिवार्य है, लेकिन इस मामले में कोर्ट से कोई अनुमति नहीं ली गई थी।
जमीन वापस लेने की मांग
इन तमाम तकनीकी और कानूनी खामियों को देखते हुए पूर्व अध्यक्ष ने जनप्रतिनिधि और उनकी बेटी के नाम की गई रजिस्ट्री को पूरी तरह अवैध घोषित करने का आग्रह किया था। उन्होंने डीएम से मांग की थी कि मामले की उच्चस्तरीय जांच कराकर यह जमीन वापस कबीर मठ के नाम दर्ज की जाए।
महंत की जान पर खतरा
अफ़सोस की बात यह है कि यह महत्वपूर्ण पत्र 11 वर्षों से जिले के प्रशासनिक दफ्तरों की फाइलों में धूल फांक रहा है। दूसरी ओर, यह कीमती जमीन कबीर मठ के हाथ से पूरी तरह निकल चुकी है।
मामला सामने आने के बाद कबीर मठ के महंत ने अपनी जान पर खतरा बताया था, जिसके बाद से यह आवाज पूरी तरह दबा दी गई।
