मोतिहारी (पूचं), [अनिल तिवारी]। शहर में बसे करीब 20 परिवारों में बड़े-बुजुर्ग अपने नाती-पोतों को परियों की कथा नहीं सुनाते। देश विभाजन का दर्द और वीर सपूतों के बलिदान की कहानी सुनाते हैं। उस मंजर को बयां करते हैं, जिसे पार कर सैकड़ों मील दूर उस शहर तक पहुंचे, जहां न कोई अपना था न ही अपनाने की वजह। जान बच जाए, बस यही चाह थी।

इन परिवारों में गुरु सिंह सभा व ईस्ट चंपारण चैंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष सतपाल सिंह छाबड़ा का भी परिवार है जो वर्ष 1947 में बंटवारे के बाद पाकिस्तान के सरगोधा में जमे कारोबार और संपत्ति को छोड़कर पूर्वी चंपारण आ गया था। अब तो उनकी यही कामना है कि ईश्वर जब भी उन्हें धरती पर भेजें, वह भारत की हो।

माता-पिता व दो भाइयों के साथ पहुंचे थे सतपाल

पाकिस्तान में जान का संकट आ गया, तब उनके पिता अमीर सिंह, माता लक्ष्मी देवी उनके दो अन्य भाइयों को लेकर यहां पहुंचे थे। कुछ दूर ट्रेन, कुछ दूर पैदल चलते हुए यहां पहुंच गए। भागते समय ट्रेन में भी कत्लेआम हो रहा था। जब माहौल शांत हुआ तो वापस जाने की हिम्मत नहीं हुई। मोतिहारी के एमएस कालेज की जमीन पर विशेष शिविर बनाया गया था। यहीं पर कुछ सिंधी लोग भी आ गए थे। वर्ष 1948 के आसपास सरकार बाहर से आए लोगों को बसाने लगी थी। हमें भी हेनरी बाजार (अब हिंदी बाजार) इलाके में कुछ जमीन दी गई। वहीं हमारा आशियाना बन गया।

समय ने सिखाई दुनियादारी

सतपाल बताते हैं कि समय ने दुनियादारी सिखा दी। पिता के साथ बिस्किट, टाफी, दालमोठ आदि बेचकर परिवार चलाने में मदद करने लगे थे। कुछ दिनों तक कचहरी में ऊनी कपड़ों की अस्थायी दुकानदारी भी की। कुछ जमा पूंजी हुई तो राजाबाजार में अपनी जमीन खरीदकर घर बना लिया। वहां भी कम चुनौती नहीं थी, लेकिन बाहर से आए शरणार्थियों ने पुरुषार्थ से कुनबा और आशियाना बसा दिया। 1969 में मां और 1994 में पिता के निधन के बाद पूरे परिवार को संभालने की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई थी।

कभी खींचा था ठेला, अब दो दर्जन लोगों को दे रहे रोजगार

बलुआ चौक पर उन्होंने 1972 में व्यवसाय की शुरुआत की। आज उनके पास आधा दर्जन से अधिक अपने प्रतिष्ठान हैं। इनमें हार्डवेयर, टूल्स व मशीनरी, मिठाई और कपड़ा आदि शामिल हैं। पुत्र इंद्रजीत सिंह भी सहयोग करते हैं। सतपाल कहते हैं कि जब वे मोतिहारी आए थे, तब उनकी उम्र करीब पांच-छह वर्ष रही होगी। मोतिहारी आने के बाद उनके पास उनका पुरुषार्थ ही एकमात्र पूंजी थी। परिवार का सहयोग और स्थानीय लोगों का साथ मिला तो इज्जत और पहचान मिली। जीवन में एक बार पाकिस्तान जाने और मातृभूमि देखने की इच्छा है।

Edited By: Ajit Kumar