मधुबनी। जिले के झंझारपुर प्रखंड अंतर्गत लालगंज गांव निवासी व सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी मंत्रेश्वर झा साहित्य जगत के लब्धप्रतिष्ठित लेखकों में गिने जाते हैं। कविता, कथा, नाटक, संस्मरणों के माध्यम से इन्होंने साहित्य के भंडार को भरने का काम किया है। अंग्रेजी, ¨हदी व मैथिली साहित्य के मूर्धन्य विद्वान श्री झा की विगत पांच दशक में लगभग चार दर्जन पुस्तकें विभिन्न विधाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी पहली पुस्तक मैथिली कविता संग्रह'खाढि़' वर्ष 1972 में प्रकाशित हुई थी। प्रफुल्लित श्री झा बताते हैं कि इसका लोकार्पण बिहार रिसर्च सोसाइटी, पटना के नामचीन विद्वानों कुमार विमल, जयदेव मिश्र, सौरभ गांगुली, दीनानाथ झा के हाथों हुआ था। उस दौर को याद करते कहा कि मेरी पहली पुस्तक की एक कविता 'वाह रे गंगे' से हुआ कुछ ऐसा विवाद खड़ा हो गया कि मैं साहित्य जगत में काफी चर्चित हो गया। पटना विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र की शिक्षा प्राप्त श्री झा ने साल 1967 में आइएएस की परीक्षा पास की। भारतीय प्रशासनिक सेवा की व्यस्तताओं के बावजूद श्री झा ने निरन्तर साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न विधाओं में अपनी लेखनी अक्षुण्ण रखी। 'कतेक डारि पर' पुस्तक पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त श्री झा को अयाची सम्मान, ज्योतरीश्वर सम्मान सहित कई सम्मान प्राप्त हैं। 'ओझा लेखें गाम बताह', 'अनचिनहार गाम', 'एक बटे दू', 'आइने के पीछे' 'दी फूल्स पैराडाइज' सहित तकरीबन ढाई दर्जन पुस्तकें विभिन्न भाषाओं, विधाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। परन्तु पहली कविता संग्रह का प्रकाशन तथा उस समय के साहित्यिक विवादों से उत्पन्न उहापोह की स्थिति आज भी इन्हें रोमांचित कर देती है।

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Posted By: Jagran