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सात समंदर पार गूंजेगी मिथिला की संस्कृति, 10 देशों की 10 मैथिलानी साझा करेंगी अपनी यात्राएं

Published: Fri, 16 Oct 2026 03:48 PM (GMT+05:30)

International Maithil Diaspora Dashashakti 2026: इंटरनेशनल मैथिल डायस्पोरा द्वारा 'दशशक्ति इंटरनेशनल 2026' का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें दुनिया ...और पढ़ें

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HighLights

  1. दशशक्ति इंटरनेशनल 2026 में 10 देशों की मैथिल महिलाएं।

  2. महिलाएं अपनी सांस्कृतिक विरासत और जीवन यात्राएं साझा करेंगी।

  3. मिथिला की संस्कृति को वैश्विक मंच पर जीवंत रखने का प्रयास।

जागरण संवाददाता, मधुबनी। Maithil Women Global Platform: मिथिला की माटी की खुशबू, यहां की भाषा, साहित्य और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत अब सात समंदर पार भी अपनी धमक बिखेर रही है।

वैश्वीकरण के इस दौर में जहां एक ओर लोग अपनी जड़ों से दूर हो रहे हैं, वहीं दुनिया के अलग-अलग कोनों में बसी मैथिल महिलाएं अपनी संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रखे हुए हैं।

इसी अनूठी पहल के तहत इंटरनेशनल मैथिल डायस्पोरा की ओर से ‘दशशक्ति इंटरनेशनल 2026’ का आयोजन किया जा रहा है, जो दुनिया भर में रह रही मैथिल महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न है।

'10 मैथिलानी, 10 जीवन यात्राएं'

'10 मैथिलानी, 10 जीवन यात्राएं, नारी शक्ति के विविध रंग' विषय पर आधारित यह विशेष श्रृंखला 11 से 20 अक्टूबर तक यूट्यूब लाइव के माध्यम से प्रसारित की जा रही है।

इस वैश्विक मंच के जरिए ओमान, नेपाल, सिंगापुर, जर्मनी, सऊदी अरब, यूनाइटेड किंगडम, नाइजीरिया, हांगकांग, मलेशिया और अमेरिका में रह रहीं 10 प्रतिभाशाली मैथिल महिलाएं अपने जीवन के संघर्ष, उपलब्धियों और सांस्कृतिक जुड़ाव की अनसुनी दास्तां साझा कर रही हैं। इस पूरे कार्यक्रम का शानदार संवाद-संचालन 'मिथिलाक बेटी' के रूप में विख्यात माला झा कर रही हैं।

महिला सशक्तीकरण के नए आयाम

इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें महिला सशक्तीकरण को केवल नौकरी, आर्थिक स्वतंत्रता या पेशेवर सफलता तक सीमित नहीं रखा गया है।

इसमें शिक्षा, साहित्य, कला, सामाजिक सेवा, पारिवारिक मूल्यों के निर्वहन और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में महिलाओं की अतुलनीय भूमिका को मुख्य पटल पर रखा गया है। यह साबित करता है कि नारी शक्ति हर मोर्चे पर अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवा रही है।

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दुनिया के कोने-कोने से जुड़ीं महिलाएं

इस वैश्विक मंच पर दुनिया के 10 देशों में रह रहीं मैथिलानियों की अपनी अनूठी संघर्ष और सफलता की गाथाएं हैं:

  1. ओमान: सलालाह में रहने वाली दीपा झा शिक्षा, सामाजिक कल्याण और ललित कला के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पूर्व हिंदी शिक्षिका के रूप में उनका योगदान समाजसेवा की मिसाल है।
  2. नेपाल: जनकपुरधाम की पूनम झा 'मैथिली' मैथिली, हिंदी और नेपाली की प्रतिष्ठित कवयित्री व लेखिका हैं, जो अपनी रचनाओं से साझा सांस्कृतिक विरासत को सींच रही हैं।
  3. सिंगापुर: ग्लोबल हिंदी फाउंडेशन की संस्थापिका ममता मंडल रणनीतिक परामर्श और हेल्थ मैनेजमेंट के साथ-साथ विदेशों में हिंदी प्रचार-प्रसार में जुटी हैं।
  4. जर्मनी: एरलांगेन में स्कूल समन्वयक के रूप में कार्यरत प्रियंका खुशबू छठ और दुर्गा पूजा जैसी भारतीय सांस्कृतिक गतिविधियों से प्रवासी समुदाय को जोड़ रही हैं।
  5. सऊदी अरब: मनीषा झा पारिवारिक संस्कारों, बच्चों के पालन-पोषण और मैथिली लोकगीतों के जरिए अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सहेजकर रखे हुए हैं।
  6. यूनाइटेड किंगडम: रीता दास मैथिली कल्चरल सोसाइटी यूके और 'दूतावास क्षत्र मैथिलाक्षर अभियान' के माध्यम से पारंपरिक लिपि के संरक्षण में जुटी हैं।
  7. नाइजीरिया: लागोस में करीब दो दशकों से रह रही मधु मिश्रा भारतीय और बंगाली समुदायों की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।
  8. हांगकांग: वर्ष 2005 से रह रहीं रसायनशास्त्र में एमएससी सरिता झा उच्च शिक्षा, परिवार और अपनी सांस्कृतिक पहचान के बीच बेहतरीन संतुलन बना रही हैं।
  9. मलेशिया: कुआलालंपुर में करीब 35 वर्षों से निवास कर रही वनस्पति विज्ञान में एमएससी वंदना झा मैथिली लोकगीतों और पर्व-त्योहारों से गहराई से जुड़ी हैं।
  10. अमेरिका: न्यू जर्सी में लगभग तीन दशकों से रह रहीं मिडिल स्कूल शिक्षिका ममता मल्लिक गायन, बागवानी और डिजिटल कंटेंट के जरिए अपनी माटी से जुड़ी हैं।

वैश्विक संवाद का माध्यम

कार्यक्रम का संचालन कर रही माला झा खुद मैथिली भाषा, संस्कृति और समाजसेवा के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं। वह मैथिल और बिहार डायस्पोरा (बीएफएम) की ग्लोबल एग्जीक्यूटिव हेड होने के साथ-साथ अमेरिका के रेडियो पर 'अपन मैथिल धाम' कार्यक्रम का संचालन करती हैं।

इंटरनेशनल मैथिल डायस्पोरा के डॉ. राजेश मिश्रा के अनुसार, इस पहल का मुख्य उद्देश्य विदेशों में बसे मैथिल समुदाय के बीच सांस्कृतिक और बौद्धिक संवाद को मजबूत करना है।

महाकवि विद्यापति की साहित्यिक परंपरा, मिथिला पेंटिंग, मैथिलाक्षर लिपि और लोक पर्वों की गूंज अब इन महिलाओं के माध्यम से वैश्विक फलक पर और अधिक सशक्त हो रही है।

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