बच्चों ने खेल-खेल में बनाई थी देवी की मूर्ति, मधेपुरा के वैष्णवी दुर्गा मंदिर में 142 से हो रही पूजा
मकदमपुर के वैष्णवी दुर्गा मंदिर में 1884 में बच्चों द्वारा मिट्टी की मूर्ति बनाने से पूजा शुरू हुई थी। 1951 ...और पढ़ें

वैष्णवी दुर्गा मंदिर। फोटो जागरण
HighLights
1884 में बच्चों ने मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजा शुरू की।
1951 में बलि प्रथा समाप्त कर वैष्णवी स्वरूप दिया गया।
नवरात्र में दो दिवसीय मेला और सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है।
प्रदीप आर्या, पुरैनी (मधेपुरा)। मकदमपुर स्थित वैष्णवी दुर्गा मंदिर में पूजा की शुरुआत वर्ष 1884 में हुई थी। उस समय यहां कुम्हार समुदाय के लोग रहते थे। नवरात्र के दौरान बच्चों ने मिट्टी से देवी की प्रतिमा बनाई।
विजयादशमी पर विसर्जन से पहले ग्रामीणों ने पंडित के सानिध्य में पूजा-अर्चना की और फिर प्रतिमा का विसर्जन किया। अगले नवरात्र में ग्रामीणों ने फूस के मंदिर में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा शुरू की।
बाद में स्व. बाबूलाल झा ने ईंट-खपरैल का मंदिर बनवाया। ग्रामीणों के सहयोग से अब मंदिर का पक्कीकरण कर उसे भव्य रूप दिया गया है।
वर्ष 1951 में जमींदार मुन्ना कुंवर, बाबूलाल झा और सत्यनारायण झा ने आराधना के बाद बलि प्रथा समाप्त कराई। इसके बाद से यहां वैष्णवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की जा रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वैष्णवी दुर्गा माता की महिमा अपरंपार है। श्रद्धालु अपनी मुराद लेकर माता के दरबार में आते हैं और उनकी मान्यता है कि कोई खाली हाथ नहीं लौटता।
आसपास के क्षेत्रों में संकट या प्रकोप आने पर लोग श्रद्धापूर्वक माता के दरबार में माथा टेककर गुहार लगाते हैं। यहां हर वर्ष नवरात्र के अवसर पर दो दिवसीय मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।
वर्ष 1951 में मां दुर्गा के उपासक जमींदार मुन्ना कुंवर, बाबूलाल झा और सत्यनारायण झा ने माता के दरबार में आराधना कर पान व फूलाईस के माध्यम से बलि प्रथा समाप्त कराई और माता को वैष्णवी स्वरूप प्रदान किया। तब से यहां लगातार वैष्णवी दुर्गा की पूजा हो रही है। - उदय यादव, पूजा सह मेला कमेटी अध्यक्ष
इस मंदिर में माता के वैष्णवी स्वरूप की पूजा-अर्चना होती है। अष्टमी से दशमी तक गर्भगृह में माता की विशेष पूजा की जाती है। इस दौरान मन्नत मांगने वाले श्रद्धालुओं का पान कराया जाता है। - पंडित पवन झा, पुजारी।
