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16 कट्ठे में कमाए 1.5 लाख: 'गरमा गोभी' ने किया मालामाल, मधेपुरा के किसानों ने बदली अपनी तकदीर

Published: Tue, 25 Aug 2026 05:48 PM (IST)

मधेपुरा के लक्ष्मीपुर लालचंद गांव ने पारंपरिक खेती छोड़ आधुनिक और बेमौसम सब्जी की खेती अपनाकर अपनी तकदीर बदल दी ...और पढ़ें

'गरमा गोभी' ने किया मालामाल, मधेपुरा के किसानों ने बदली अपनी तकदीर

'गरमा गोभी' ने किया मालामाल, मधेपुरा के किसानों ने बदली अपनी तकदीर

HighLights

  1. लक्ष्मीपुर लालचंद गांव ने अपनाई आधुनिक सब्जी खेती।

  2. खेत में ही लगती है थोक सब्जी मंडी।

  3. हल्दी भोपाल के कैंसर अस्पताल तक पहुंच रही।

शैलेश कुमार, बिहारीगंज (मधेपुरा)। मधेपुरा जिले के बिहारीगंज प्रखंड का लक्ष्मीपुर लालचंद गांव अब पारंपरिक खेती छोड़ आधुनिक और बेमौसम सब्जी की खेती से अपनी तकदीर बदल रहा है। यहां के 300 से ज्यादा किसान अब मिर्च, भिंडी, परवल, और हल्दी जैसी सब्जियां उगा रहे हैं।

सबसे खास बात यह है कि इन्हें बेचने के लिए बाजार नहीं जाना पड़ता, बल्कि सुबह सुबह खेतों में ही मंडी लग जाती है और भागलपुर से लेकर सहरसा तक के व्यापारी यहीं से सब्जियां खरीदते हैं। यहां की हल्दी तो भोपाल के कैंसर अस्पताल तक जा रही है।

अच्छी कमाई के चलते गांव में पक्के मकान बन गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अब हमलोग अब खुद रोजगार दे रहे हैं, गांव के लोगों को रोजगार के लिए बाहर नहीं जाना पड़ रहा है।

ऑफ सीजन की सब्जी की खेती के प्रयोग ने दिखाई समृद्धि की राह:

हर किसान की सोच रहती है कि उसे अपनी फसल का ज्यादा से ज्यादा उपज हो सके। ज्यादा उपज होने पर ही अधिक मुनाफा होने की संभावना रहती है। इसके लिए लक्ष्मीपुर लालचंद के किसानों ने ऑफ सीजन सब्जी की खेती का प्रयोग किया, जो सफल रहा।

बदलते परिवेश में यहां के किसान परंपरागत खेती छोड़कर नई तकनीकी और आधुनिक उपाय अपनाने लगे हैं और सब्जी की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। वर्तमान में ऑफ सीजन में भी फूलगोभी और बंदगोभी की खेती की गई है। जिसे गरमा गोभी की खेती कहा जाता है।

हालांकि गरमा गोभी खेती बड़ी सूझ-बूझ और मेहनत से किया जाता है। लक्ष्मीपुर लालचंद के किसान फूलगोभी व बंदगोभी की खेती कर मालामाल हो रहे हैं।

किसानों का कहना है कि परंपरागत के बजाय आधुनिक तौर तरीके अपनाया। इस वर्ष मौसम का भी साथ मिला और गरमा फूलगोभी और बंधगोभी खूब फली है। बाजार में कीमत भी अच्छी मिल रही है।

आठ कट्ठे में गरमा बंदगोभी की खेती से कमाए डेढ़ लाख रुपये:

किसान कैलाश मंडल और ललिता देवी कहती हैं कि इस वर्ष 8-8 कट्ठा खेत में गरमा बंदगोभी की खेती की। शुरुआत में गोबर खाद का उपयोग किया गया। फसल में कीड़े लगने पर दवा का प्रयोग किया गया। गोभी का सीजन समाप्त होने के कारण काफी मेहनत कर फसल को बचाने में कामयाबी मिली।

बंदगोभी की फसल बड़ी-बड़ी साइज देखकर सब्जी कारोबारी खेत में पहुंचकर 20-25 रुपये किलो खरीद करते हैं।

कैलाश मंडल और ललिता देवी बताती हैं कि बंधगोभी की खेती से महज 16 कट्ठे में डेढ़ लाख रुपये की आमदनी हुई है। अब फसल लगभग कटने को है। इसके तुरंत बाद अगैता फूलगोभी की खेती की जाएगी।

गरमा फूलगोभी की खेती में बरतनी पड़ती है सावधानियां:

किसान प्रमोद मंडल का कहना है कि फूलगोभी की खेती सर्दी के मौसम में होती हैं। ग्रीष्मकाल में यह बाजार से गायब हो जाती है। वजह, गर्मी में इसकी खेती नहीं होती थी। इस साल प्रयोग के तौर पर चार कट्ठा खेती किी, जिसका नतीजा भी सकारात्मक रहा। हालांकि, गरमा फूलगोभी की खेती में काफी मेहनत लगता है। इसके लिए काफी सावधानियां बरतनी पड़ती हैं।

समय-समय पर मौसम को देखते हुए तेज धूप और गर्मी से बचाव के लिए घरेलू उपाय करना पड़ता हैं। इसके लिए काफी उन्नत किस्म की बीज व दवाओं का उपयोग समय-समय पर करना पड़ता है। गरमा फूल गोभी की खेती के लिए फरवरी माह में नर्सरी तैयार की जाती है।

मई से जून माह में फूलगोभी फसल सब्जी मंडी में मिलती हैं। इस वर्ष गरमा फूलगोभी का थोक भाव 60-80 रुपये प्रति किलो बिक्री हुआ है, जिससे अच्छा मुनाफा मिला है।

इसी तरह युवा किसान गुलशन कुमार बताते हैं कि वे हल्दी की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। हल्दी की खरीददारी के लिए बड़े- बड़े शहरों से व्यपारी आते हैं।

भोपाल के कैंसर अस्पताल में दवा के रूप में उपयोग होता है। एजेंट के माध्यम से हल्दी की सप्लाई कैंसर अस्पताल की जा रही है। इसलिए लक्ष्मीपुर लालचंद में हल्दी खेती का रकवा लगातार बढ़ रहा है।

चायं टोला में लग रही सब्जी मंडी:

लक्ष्मीपुर लालचंद के अधिकांश किसान पारंपरिक खेती छोड़कर सब्जी खेती कर रहे हैं। यही वजह है कि चांयटोला में थोक सब्जी की मंडी लगती है। मधेपुरा के अलावा पूर्णिया, सहरसा, खगड़िया, भागलपुर सहित दूर-दराज से व्यापारी यहां खरीददारी को पहुंचते हैंं। किसान यहां ऑफ सीजन की खेती अब बहुतायत में करने में लगे हैं। कृषि विज्ञानियों की निरंतर कोशिशों और शोधों के कारण नई-नई किस्में विकसित की गई है, जिसका लाभ किसान उठा रहे हैं। - सुबेश कुमार, उद्यान पदाधिकारी, बिहारीगंज (मधेपुरा)