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14 सितंबर को मनेगी हरितालिका तीज: 7:06 बजे तक निपटा लें पूजा; मिथिला और वाराणसी पंचांग के अनुसार मुहूर्त समझ लें

Published: Sat, 12 Sep 2026 11:53 AM (GMT+05:30)

Hartalika Teej 2026 Puja Muhurat: इस वर्ष हरितालिका तीज का महापर्व 14 सितंबर को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया ...और पढ़ें

Hartalika Teej 2026 Puja Muhurat: अखंड सौभाग्य का महापर्व हरितालिका तीज 14 सितंबर को! जानें सुबह व प्रदोष काल में पूजा का समय और पारण के सटीक नियम

Hartalika Teej 2026 Puja Muhurat: अखंड सौभाग्य का महापर्व हरितालिका तीज 14 सितंबर को! जानें सुबह व प्रदोष काल में पूजा का समय और पारण के सटीक नियम

HighLights

  1. हरितालिका तीज 14 सितंबर को, निर्जला व्रत रखेंगी महिलाएं।

  2. सुबह 7:06 बजे तक पूजा का शुभ मुहूर्त, शाम को भी मान्य।

  3. बालू से शिवलिंग निर्माण, सुहाग सामग्री अर्पण की परंपरा।

जागरण संवाददाता, लखीसराय। Hartalika Teej 2026 Puja Muhurat:  सुहागिन महिलाओं के अखंड सौभाग्य, अटूट दांपत्य प्रेम और पति की दीर्घायु का महापर्व हरितालिका तीज इस वर्ष 14 सितंबर, सोमवार को श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाया जाएगा।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का आरंभ 13 सितंबर की सुबह से होकर 14 सितंबर की सुबह तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार, तृतीया तिथि का सूर्योदय 14 सितंबर को होने के कारण उदयातिथि के सिद्धांत पर इसी दिन व्रत का अनुष्ठान करना शास्त्रसम्मत माना गया है। लखीसराय सहित पूरे बिहार और पूर्वांचल में महिलाएं इस दिन 24 घंटे का निर्जला व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करेंगी।

पूजा के सटीक समय को लेकर मिथिला और वाराणसी पंचांगों की गणना में सूक्ष्म अंतर सामने आया है। मिथिला पंचांग के अनुसार, प्रातःकालीन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 5:35 बजे से 7:06 बजे तक रहेगा। वहीं, वाराणसी पंचांग के अनुसार यह समय सुबह 6:05 बजे से 7:06 बजे तक निर्धारित है।

Haritalika Teej 2024 Date Puja Muhurat Significance (1)

दोनों पंचांगों के आकलन में एक बात समान है कि प्रातःकाल की मुख्य पूजा सुबह 7:06 बजे से पहले संपन्न कर लेना श्रेयस्कर रहेगा। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि जिन व्रती महिलाओं के लिए किसी कारणवश सुबह 7:06 बजे तक पूजन संपन्न करना संभव न हो, वे शाम के समय प्रदोष काल में भी पूर्ण विधि-विधान से शिव-पार्वती का पूजन कर सकती हैं, जो धर्मशास्त्रों में पूर्णतः मान्य है।

बालू से शिवलिंग निर्माण और सुहाग सामग्री अर्पण की परंपरा

व्रत के दिन महिलाएं ब्रह्ममुहूर्त में स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर नए वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद पूजा स्थल को पवित्र कर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा या फिर शुद्ध गीली मिट्टी और गंगा की बालू से विधिवत शिवलिंग बनाकर स्थापित किया जाता है।

  • उदयातिथि की मान्यता के अनुसार इस वर्ष 14 सितंबर (सोमवार) को पूरे विधि-विधान से रखा जाएगा हरितालिका तीज का निर्जला व्रत

  • मिथिला पंचांग के अनुसार सुबह 5:35 से 7:06 बजे तक और वाराणसी पंचांग के मुताबिक सुबह 6:05 से 7:06 बजे तक पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त

  • प्रातःकाल पूजा न कर पाने वाली व्रती महिलाएं शाम को प्रदोष काल में भी कर सकती हैं भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश की आराधना

  • 14 सितंबर को दिनभर निर्जला उपवास, रात्रि जागरण और कथा श्रवण के उपरांत 15 सितंबर की सुबह पुन: पूजन कर खोला जाएगा व्रत

माता पार्वती को सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी, चुनरी सहित सोलह श्रृंगार की सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है और महादेव को बेलपत्र, धतूरा, भांग व श्वेत पुष्प चढ़ाए जाते हैं। इसके उपरांत विधिवत हरितालिका तीज व्रत कथा का श्रवण किया जाता है और धूप-दीप से सामूहिक आरती उतारी जाती है।

माता पार्वती के कठोर तप की स्मृति, 15 सितंबर को होगा पारण

हरितालिका तीज भगवान शिव और जगतजननी मां पार्वती के अटूट संकल्प, तप और निष्ठा का पावन प्रतीक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को वर रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर और निराहार तपस्या की थी। उनकी सखियां उन्हें हरण कर (ले जाकर) घने एकांत वन में ले गई थीं, जहां उन्होंने भाद्रपद शुक्ल तृतीया को बालू का शिवलिंग बनाकर घोर तप किया था; सखियों द्वारा 'हरित' (हरण) किए जाने के कारण ही इस व्रत का नाम 'हरितालिका' पड़ा।

इस व्रत की महत्ता और पूजन पद्धति का सविस्तार वर्णन भविष्योत्तर पुराण, निर्णयसिंधु, व्रतार्क और व्रतराज जैसे प्राचीन धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में मिलता है। यह अत्यंत कठिन और निर्जला व्रत है। महिलाएं 14 सितंबर को पूरे दिन उपवास रखकर रात्रि में भजन-कीर्तन और जागरण करेंगी। इसके बाद अगले दिन यानी 15 सितंबर की सुबह स्नान कर शिव-पार्वती की पुनः विधिपूर्वक पूजा-आरती की जाएगी और भोग अर्पित होगा। इसके पश्चात भगवान का चरणामृत या प्रसाद ग्रहण कर पारण किया जाएगा, जिसके बाद ही जल और सुपाच्य सात्विक आहार ग्रहण करने का विधान है।

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